जलवायु बदलाव : खतरनाक होगी इसकी अनदेखी
हाल में नई दिल्ली में पर्यावरण पर राष्ट्रीय सम्मेलन 2025 का आयोजन किया गया। दो दिन के इस सम्मेलन का आयोजन राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने किया।
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गौरतलब है कि एनजीटी की स्थापना राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के तहत की गई है। यह विशेष न्यायिक निकाय है जिसका मुख्यालय दिल्ली में है। एनजीटी के अध्यक्ष सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश होते हैं। अन्य न्यायिक सदस्य उच्च न्यायालयों के सेवानिवृत्त न्यायाधीश होते हैं। एनजीटी का कार्य पर्यावरण से जुड़े विवादों को प्रभावी तरीके से शीघ्र निपटाना है। इसलिए इस सम्मेलन की महत्ता स्वयंसिद्ध है।
सम्मेलन में चार प्रमुख तकनीकी सत्र आयोजित किए गए जिनमें जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण नियंत्रण, जैव-विविधता संरक्षण तथा सतत विकास सहित पर्यावरण के समक्ष चुनौतियों के समाधान पर विचार-विमर्श किया गया। सम्मेलन में भावी पीढ़ियों को स्वाच्छ पर्यावरण उपलब्ध कराने का नैतिक दायित्व माना गया। चूंकि सभी के सामूहिक प्रयासों से ही पर्यावरण का संरक्षण-संवर्धन संभव है, इसलिए नागरिकों से पर्यावरण संरक्षण पर ध्यान केंद्रित करने का आग्रह किया गया। क्लाइमेट चेंज की भयावह समस्या किसी एक राष्ट्र तक सीमित नहीं है, इसलिए सम्मेलन में वैश्विक पर्यावरण की चुनौतियों से निपटने के लिए सीमा पार सहयोग और नवाचारी नीतियों की आवश्यकता को भी रेखांकित किया गया ताकि एक साथ पारिस्थितिक संसाधनों के संरक्षण और आर्थिक विकास को आगे बढ़ाया जा सके।
जहां तक भारत का संबंध है तो केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अनुसार भारत कम कार्बन वाली प्रौद्योगिकी में नवाचार को बढ़ावा देने पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। मंत्रालय का मानना है कि विकासशील देशों के लिए त्वरित पर्यावरणीय आर्थिक विकास ही जलवायु परिवर्तन से ठोस बचाव है। भारत न केवल कार्बन फुटप्रिंट कम करने पर ध्यान केंद्रित कर रहा है, बल्कि हरित ऊर्जा क्षेत्र के माध्यम से लाखों नौकरियों का सृजन भी कर रहा है। सम्मेलन को हम क्लाइमेट चेंज की समस्या से निपटने में सहयोग को बढ़ावा देने, जागरूकता लाने तथा पर्यावरण संरक्षण के सामूहिक मिशन को आगे बढ़ाने की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम कह सकते हैं।
हम देख रहे हैं कि जैसे-जैसे वैश्विक तापमान बढ़ रहा है, वैसे-वैसे न केवल ग्लेशियर पिघल रहे हैं, बल्कि जंगल की आग भी बड़े पैमाने पर तबाही मचा रही है। ग्लेशियरों के पिघलने से न केवल पर्यावरण, बल्कि मानव जीवन और अर्थव्यवस्था पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। समुद्र स्तर में वृद्धि होने से तटीय क्षेत्रों और द्वीपीय देशों में बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए भारत में मुंबई, कोलकाता और चेन्नई जैसे तटीय शहरों को खतरा है। नदियों में पानी की मात्रा अचानक बढ़ने से बाढ़ और भूस्खलन का खतरा भी बढ़ जाता है। ग्लेशियरों से पिघल कर आने वाला पानी नदियों का मुख्य स्रेत होता है, खासकर गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु जैसी नदियों के लिए।
तीनों नदियां देश को 63 प्रतिशत के आसपास पानी देती हैं, जिसमें अकेले गंगा का हिस्सा लगभग 25 प्रतिशत है। इसलिए ग्लेशियर खत्म होने की स्थिति में इन नदियों में पानी की मात्रा घट जाएगी, जिससे भविष्य में भारत, पाकिस्तान, नेपाल और बांग्लादेश जैसे देशों में जल संकट गहरा सकता है। कई जीव-जंतु और पौधे ठंडी जलवायु में जीवित रहते हैं। ग्लेशियरों के पिघलने से उनका आवास नष्ट हो जाता है, जिससे कई प्रजातियों के विलुप्त होने का भी खतरा है। ध्रुवीय भालू, हिम तेंदुआ और अन्य आर्कटिक जीव इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
नदियों में पानी की कमी होने से सिंचाई पर प्रभाव पड़ता है, जिससे खाद्य सुरक्षा प्रभावित होती है। क्लाइमेट चेंज की वजह से बर्फबारी में कमी आने से स्कीइंग और अन्य शीतकालीन खेलों का व्यवसाय प्रभावित होता है, और आजीविका पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है। जंगल की आग की बढ़ती घटनाएं भी चिंतनीय हैं, जो शुष्क मौसम और बढ़ते तापमान के कारण जंगलों को आग का गोला बना रही हैं। दक्षिण कोरिया और कैलिफोर्निया में हाल की आग जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरों की गंभीर चेतावनी हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण लंबे समय तक सूखा, बढ़ते तापमान और बदले वष्रा पैटर्न जंगल की आग के लिए अनुकूल स्थितियां बना रहे हैं।
आज प्राइमरी स्तर से ही पर्यावरण शिक्षा देना जरूरी है। नीति बनाने में प्रशासन और वैज्ञानिकों के साथ ही स्थानीय लोगों की भागीदारी भी जरूरी है। पूरे हिमालयी क्षेत्र के पर्यावरण और पारिस्थितिकी का नये सिरे से गहराई से अध्ययन किया जाना जरूरी है। लेकिन महत्त्वपूर्ण जलवायु परिवर्तन के मूल कारण-ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन-को पहले नियंत्रित करना होगा। कुछ विश्व नेता अभी भी जलवायु परिार्तन की गंभीरता को नजरअंदाज कर रहे हैं। इस संकट के हल के प्रति पूरी तरह उदासीन दिखाई देते हैं। वे भूल जाते हैं कि क्लाइमेट चेंज की रफ्तार यदि ऐसी ही बनी रही तो मानव जीवन का अस्तित्व बचा नहीं रह सकेगा।
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