बुलडोजर पर प्रहार

Last Updated 03 Apr 2025 12:43:35 PM IST

उप्र के इलाहाबाद में बुलडोजर से घर ढहाने को सुप्रीम कोर्ट ने अमानवीय और अवैध करार देते हुए कहा कि इससे अदालत की आत्मा को झटका लगा है।


बुलडोजर पर प्रहार

उप्र सरकार को प्रत्येक परिवार को दस लाख रुपये का मुआवजा देने के साथ अधिकारियों को उनकी अत्याचारिता के लिए सबक सिखाने का आदेश दिया। पीठ ने कहा कि इस देश में आश्रय का अधिकार, कानून की उचित प्रक्रिया और कानून का शासन जैसी कोई चीज है।

आवासीय परिसरों को मनमाने तरीके से ध्वस्त करने पर विकास अधिकारियों को यह याद रखने को कहा कि आश्रय का अधिकार मौलिक अधिकार है और संविधान के अनुच्छेद 21(जीवन व स्वतंत्रता) का अभिन्न अंग है। सभी छह याचिकाकर्ता इलाहाबाद के लूकरगंज के निवासी हैं जिनके घर मार्च, 2021 में बुलडोजर से ध्वस्त किए गए थे।

उनका कहना है कि स्थानीय अधिकारियों ने गलत धारणाओं के आधार पर घर गिराया कि वे माफिया अतीक अहमद और उसके भाई अशरफ अहमद की संपत्तियां हैं। शीर्ष अदालत ने अंबेडकरनगर जिले में बुलडोजर कार्रवाई का भी हवाला दिया। झोपड़ियों को ध्वस्त किए जाने पर कहा कि वह बहुत परेशान करने वाला और चौंकाने वाला है। उप्र सरकार के वकील ने दलील दी कि ये मकान अवैध थे इसलिए ध्वस्त किए गए। इनके साथ अन्य संपत्तियां भी ढहाई गई।

हैरत है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने तोड़-फोड़ की इस कार्रवाई के खिलाफ दायर याचिका खारिज कर दी थी। राज्य सरकार का दावा था कि बुलडोजर कार्रवाई पेशेवर अपराधियों और माफिया के खिलाफ की गई।

इस हकीकत के बावजूद सरकारी तंत्र को उचित नोटिस देने के साथ ही रहवासियों को कागजात दिखाने और मालिकाना साबित करने का वक्त देना चाहिए था। रही बात अवैध कब्जों की तो यह राज्य सरकारों का जिम्मा है कि वे निकाय और स्थानीय विकास अधिकारियों को इतने मुस्तैद बनाएं कि वे कब्जा पक्का करने से पूर्व ही हरकत में आएं। भू-माफिया और सरकारी मिली-भगत के बगैर कोई कब्जा संभव नहीं है।

बुलडोजर चलाना समस्या का हल नहीं कहा जा सकता। सरकार को अपनी लापरवाहियों और गैर-जिम्मेदाराना रवैये से सबक लेना चाहिए। इस तरह की कार्रवाइयां बगैर सरकार के इशारे के अधिकारी नहीं कर सकते। इसलिए असली लताड़ तो सरकार को ही लगानी चाहिए। जनता से जीने का अधिकार छीनने का नतीजा भुगतने को उसे भी तैयार रहना होगा।



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