कृषि क्षेत्र : करवट बदलता भारत
भारत में लगभग 60 फीसद आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है और आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर है। जबकि, कृषि क्षेत्र का भारत के सकल घरेलू उत्पाद में योगदान केवल 18 फीसद के आसपास बना हुआ है।
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इस प्रकार, भारत में गरीबी को समूल नष्ट करना है तो इस क्षेत्र में आर्थिक सुधार कार्यक्रम लागू करने ही होंगे। भारत ने हालांकि आर्थिक क्षेत्र में पर्याप्त सफलताएं अर्जित की हैं और विश्व की पांचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। शीघ्र ही अमेरिका एवं चीन के बाद विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है।
भारत विश्व में सबसे अधिक तेज गति से बढ़ती अर्थव्यवस्था भी बन गया है। परंतु, इसके आगे की राह कठिन है क्योंकि केवल सेवा क्षेत्र एवं उद्योग क्षेत्र के बल पर और अधिक तेज गति से आगे नहीं बढ़ा जा सकता है और कृषि क्षेत्र में आर्थिक विकास की दर को बढ़ाना होगा। भारत में हालांकि कृषि क्षेत्र में कई सुधार कार्यक्रम लागू किए गए हैं, परंतु अभी भी बहुत कुछ किए जाने की आवश्यकता है। किसानों के पास पूंजी का अभाव रहता था और वे बहुत ऊंची ब्याज दरों पर महाजनों से ऋण लेते थे और उनके जाल में जीवन भर के लिए फंस जाते थे, परंतु, आज इस समस्या को बहुत बड़ी हद तक हल किया जा सका है और किसान क्रेडिट कार्ड के माध्यम से किसान को आसान नियमों के अंतर्गत बैंकों से पर्याप्त ऋण की सुविधा उपलब्ध है। इस सुविधा का लाभ देश के करोड़ों किसान उठा रहे हैं। दूसरे, इसी संदर्भ में किसान सम्मान निधि योजना भी किसानों के लिए लाभकारी सिद्ध हो रही है। इस योजना का लाभ भी करोड़ों किसानों को मिल रहा है। भारतीय कृषि आज भी मानसून पर निर्भर है। ग्रामीण इलाकों में सिंचाई सुविधाओं का अभाव है। इस समस्या को हल करने के लिए प्रति बूंद अधिक फसल की रणनीति पर काम किया जा रहा है, एवं सूक्ष्म सिंचाई पर बल दिया जा रहा है ताकि खेती में पानी के उपयोग को कम किया जा सके तथा जल संरक्षण के साथ सिंचाई की लागत भी कम हो सके।
देश में सीमांत एवं छोटे किसानों की संख्या करोड़ों की संख्या में हो गई है। ये किसान किसी तरह अपना और परिवार का भरण-पोषण कर पा रहे हैं। इनके लिए कृषि लाभ का माध्यम नहीं रह गया है। इन तरह की समस्याओं के हल के लिए केंद्र सरकार विभिन्न उत्पादों के लिए प्रति वर्ष न्यूनतम समर्थन मूल्य में, मुद्रास्फीति को ध्यान में रखकर, वृद्धि करती रहती है। इससे किसानों को लाभ हो रहा है। भंडारण सुविधाओं (गोदामों एवं कोल्ड स्टोरेज का निर्माण) में खासी वृद्धि हुई है। परिवहन सुविधाओं में सुधार के चलते किसान कृषि उत्पादों को लाभ पर बेचने में सफल हो रहे हैं। इन सुविधाओं में कमी के चलते किसान कृषि उत्पादों को बाजार में बहुत सस्ते दामों पर बेचने पर मजबूर हुआ करता था। खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना भारी मात्रा में की जा रही है। इससे कृषि क्षेत्र में मूल्य संवर्धन को बढ़ावा मिल रहा है। कृषि उत्पादों की बर्बादी रोकने में सफलता मिल रही है। उच्च गुणवत्ता वाले बीजों के उपयोग पर ध्यान दिया जा रहा है ताकि उर्वरकों के उपयोग की आवश्यकता कम हो एवं कृषि उत्पादकता बढ़े। मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना भी किसानों की मदद कर रही है। राष्ट्रीय कृषि बाजार को स्थापित करने के प्रयास जारी हैं ताकि किसान सीधे ही उपभोक्ता को फसल बेच सके।
कृषि फसल बीमा के उपयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है ताकि सूखे, अधिक वष्रा, चक्रवात, अतिवृष्टि, अग्नि आदि जैसी आपदाओं से प्रभावित फसल के नुकसान से किसान को बचाया जा सके। करोड़ों की संख्या में किसान फसल बीमा योजना का लाभ उठा रहे हैं। खेती किसानी का काम पूरे वर्ष भर नहीं होता। इसलिए किसानों के लिए अतिरिक्त आय के साधन निर्मिंत करने के उद्देश्य से पशुपालन, मधुमक्खी पालन, पोल्ट्री, मत्स्य पालन आदि कृषि सहायक क्षेत्रों पर भी ध्यान दिया जा रहा है।
दुनिया के प्रमुख खाद्य पदाथरे यथा गेहूं एवं चावल का भारत विश्व में दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। कई सूखे मेवों, कृषि आधारित कपड़े, कच्चे माल, जड़ फसलों, दालों, मछली पालन, अंडे, नारियल, गन्ना एवं कई सब्जियों का बड़ा उत्पादक है। पिछले कुछ वर्षो के दौरान भारत 80 प्रतिशत से अधिक कृषि उपज फसलों (काफी व कपास जैसी नकदी फसलों सहित) के साथ दुनिया का पांचवा सबसे बड़ा उत्पादक बन गया। भारत सबसे तेज विकास दर के साथ पशुधन एवं मुर्गी मांस के क्षेत्र में दुनिया के पांच सबसे बड़े उत्पादक देशों में शामिल हो गया है। कुल मिलाकर भारतीय अर्थव्यवस्था में किसी भी दृष्टि से कृषि क्षेत्र के योगदान को कमतर नहीं आंका जा सकता। अधिकतम उपभोक्ता तो आज भी ग्रामीण इलाकों में ही रह रहे हैं। उद्योग क्षेत्र में निर्मिंत उत्पादों की मांग भी ग्रामीण इलाकों से ही निकल रही है। देश में कृषि क्षेत्र को बढ़ावा देना ही होगा।
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