नागपुर हिंसा : ऐसी हिंसा से क्या डरना
नागपुर की हिंसा ने फिर पूरे देश को भयभीत किया। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का वक्तव्य था कि सीसीटीवी फुटेज से 104 दंगाइयों की पहचान हो गई है, नष्ट की गई संपत्तियों की भरपाई दंगाइयों से की जाएगी और वे जुर्माना नहीं देते तो उनकी संपत्ति जब्त कर उससे क्षतिपूर्ति होगी।
![]() नागपुर हिंसा : ऐसी हिंसा से क्या डरना |
वास्तव में 33 से ज्यादा पुलिसकर्मिंयों का घायल होना, भारी संख्या में वाहनों की तोड़फोड़ या जलाना, जगह-जगह घरों और दुकानों का क्षतिग्रस्त होना पहले से ही संकेत दे रहे थे कि हमले सुनियोजित थे।
विधानसभा में मुख्यमंत्री फडणवीस ने बयान भी दिया था कि यह सुनियोजित हमला लगता है। नागपुर पुलिस की प्राथमिकी, अभी तक की छानबीन, सीसीटीवी फुटेज और हिंसा के पैटर्न बताते हैं कि हिंसा तात्कालिक गुस्से की परिणति नहीं, शत-प्रतिशत सुनियोजित थी। तत्कालिक गुस्से में छिटपुट हल्की-फुल्की हिंसा हो सकती है। चेहरे ढंके नकाबपोश हमला करने किसी घटना से त्वरित गुस्से में नहीं दिख सकते। उतनी संख्या में पत्थर कहां से आएंगे? पेट्रोल बम अचानक कैसे तैयार हो गया? विश्व हिन्दू परिषद (विहिप) और बजरंग दल द्वारा 17 मार्च को औरंगजेब की कब्र हटाने के लिए विरोध प्रदर्शन का आह्वान पहले से था। इनने छत्रपति शिवाजी महाराज चौक पर प्रतीकात्मक कब्र और पुतला जलाया। इसके समानांतर क्या हो रहा था? माइनॉरिटी डेमोक्रेटिक पार्टी का शहर अध्यक्ष फहीम अहमद 50-60 लोगों को लेकर गणोशपेठ पुलिस थाना पहुंचा और लिखित शिकायत दर्ज कराई कि हरे कपड़े पर कलमा लिख कर जलाया जा रहा है।
पुलिस ने उसकी शिकायत पर विहिप और बजरंग दल के आठ लोगों पर मामला भी दर्ज किया। बावजूद सोशल मीडिया पर अफवाह फैलाई गई कि पवित्र कुरान की आयतें जलाई गई हैं, लोगों के घर से निकलने की अपील की गई। सोशल मीडिया पर झूठ फैलाया गया कि हिंसा में दो लोगों की मृत्यु हो गई है। एक सोशल मीडिया अकाउंट बांग्लादेश से मिला है, जिसमें लिखा गया कि यह छोटा दंगा था, इससे बड़ा दंगा आगे होगा। उसके बाद फहीम खान थाने से आकर 400-500 लोगों, जिनके हाथों में हथियार थे, को लेकर छत्रपति शिवाजी महाराज चौक यानी धरना स्थल पर पहुंच गया। पुलिस द्वारा भीड़ से वापस जाने के आग्रह को अनसुना करते हुए भीड़ भड़काऊ और उकसाऊ नारे लगाने लगी। प्रदर्शनकारियों में शामिल 400-500 लोग कुल्हाड़ियों, पत्थरों, लाठी, रॉड और अन्य ऐसी सामग्रियों को लहरा रहे थे। इसी दौरान भालदारपुरा में पुलिस पर पत्थरों से हमले की भी घटना हुई। सबसे शर्मनाक अंधेरे का लाभ उठा कर महिला पुलिस के साथ छेड़खानी और दुर्व्यवहार था। महिला पुलिस के कपड़े उतारने की कोशिश की गई। गीतांजलि चौक पर भीड़ ने पुलिस वाहनों पर पेट्रोल बम से हमला किया और पुलिस के दो वाहनों में आग लगा दी। गंजीपुरा में फ्लाईओवर निर्माण के लिए खड़ी दो क्रेन को पेट्रोल बम से आग लगा दी गई। ड्यूटी पर मौजूद पुलिस अधिकारियों पर पत्थरों और घातक हथियारों से हमलाकर घायल कर दिया गया। देखते-देखते महल, कोतवाली, गणोशपेठ और चिटिनस पार्क समेत शहर के विभिन्न इलाकों से हिंसा की सूचना आने लगी।
यहां कुछ और सच्चाई को सामने लाना आवश्यक है। नागपुर के सीए रोड, भालदारपुरा, गंजी पेठ, हंसापुरी, गांधी बाग, चिटनवीस पार्क, आदि क्षेत्र में ज्यादातर दुकानें पुरानी बाइक एवं ऑटो स्पेयरपार्ट्स की हैं। सभी दुकानें एक समुदाय की हैं। आश्चर्यजनक रूप से सोमवार को दुकानें सुबह से ही बंद थीं। मोबिनपुरा में सामान्यतया 150 गाड़ियां खड़ी रहती थीं। एक गाड़ी नहीं थी वहां। क्या यह बिना योजना के संभव है? फिर केवल हिन्दू घर एवं दुकान ही हिंसा के शिकार थे। पत्थरबाजी में घायल नागपुर के डीसीपी निकेतन कदम ने कहा कि एक घर में कुछ लोग छिप कर पत्थरबाजी कर रहे थे। टीम वहां गई तो दूसरी ओर से 100 से ज्यादा लोगों की भीड़ आई। मैंने उन्हें रोकने की कोशिश की तो एक ने कुल्हाड़ी से हमला कर दिया। कई छतों से पत्थर फेंके जा रहे थे। पत्थर छत पर कैसे पहुंचे, कुछ तो प्लानिंग थी। वाकई इतने घरों में पत्थर पैदा नहीं हो गए। साफ है कि पत्थर पहले से तैयार करके रखे गए थे।
साफ दिखती सुनियोजित हिंसा पर हो रही राजनीति भी डराने वाली है। सच को सच के रूप में समझ कर स्पष्ट न बोला जाए तो परिणाम विनाशकारी होंगे। कोई किसी विषय पर लोकतांत्रिक तरीके से विरोध प्रदर्शन कर रहा है तो उसे मजहब के विरु द्ध प्रचारित करने का अर्थ क्या है? कलमा लिखे हरे चादर जलाए ही नहीं गए। इस तरह के झूठ फैलाने वाले लोगों को इस्लाम के नाम पर भड़का रहे थे। 60 से ज्यादा सोशल मीडिया अकाउंट बंद किए गए हैं। मुख्यमंत्री फडणवीस दोषियों को सजा दिलाने का जैसा संकल्प दिखा रहे हैं, उस पर संदेह करने का कोई कारण नहीं है। लेकिन क्या इस मामले में दंड दिलाना ही पर्याप्त है? वैसे इस मामले में भी न्यायालय में बड़े-बड़े वकील संगठित होकर कितनी बाधाएं खड़ी करेंगे इसका अंदाजा हम सबको है। विचार करने वाली बात है कि पूरे देश में जगह-जगह इस तरह की हिंसा का एक ही पैटर्न देखा जा रहा है। इतने ईट-पत्थर, पेट्रोल बम आदि तत्काल पैदा नहीं हो सकते। पूरी तैयारी करनी होती है। हाल में महू, संभल से लेकर नागपुर तक देखिए, आपको मोटा-मोटी एक ही तरह का पैटर्न दिखेगा। औरंगजेब की कब्र हटाने की मांग से इतनी संख्या में किसी समुदाय के लोगों के अंदर गुस्सा पैदा होने का कारण क्या हो सकता है?
औरंगजेब जैसे आततायी, धर्माध, बुरे शासक के लिए उसकी मृत्यु के 300 से ज्यादा वर्षो बाद अगर लोग उसे इस्लाम का अच्छा सेवक या मजहब के रूप में अपनी प्रेरणा मानते हुए जान देने और लेने तक पर उतारू हैं तो यह भारत की दृष्टि से सामान्य खतरे का संकेत नहीं है। देख लीजिए, केवल औरंगजेब नहीं, महमूद गजनवी और उसके भांजे सालार मसूद तक के प्रति इतना समर्थन कैसे कि उन पर प्रश्न उठाने के विरु द्ध खुलेआम बयानबाजी और हिंसा हो रही है। इसका मतलब तो यह हुआ कि कल कोई नादिर शाह और अहमदशाह अब्दाली को भी इस्लाम का ध्वजवाहक मान कर उनका महिमा मंडन करेगा और विरोध करने वालों के विरु द्ध हिंसा करेगा। जरा सोचिए, आज जो जनरल डायर, लॉर्ड क्लाइव आदि के पक्ष में खड़ा होंगे उन्हें हम आप क्या मानेंगे?
(लेख में विचार निजी हैं)
| Tweet![]() |