साधना
आपकी भावनाएं कोई समस्या नहीं है, बिना भावनाओं के आप एक सूखी लकड़ी की तरह होंगे। ये भावनाएं ही हैं, जो आपके जीवन को मधुर और खूबसूरत बनाती हैं।
![]() जग्गी वासुदेव |
ये भावनाएं ही हैं, जो आपके जीवन में प्रवाह लाती हैं। लेकिन यही भावनाएं तब एक समस्या बन जाती हैं, जब ये आपके नियंत्रण से बाहर जाकर पागलपन का रूप ले लेती हैं। अगर आप भावनाओं पर ध्यान देते हैं, उनके प्रति जागरूक होते हैं, तो आप जैसे-जैसे जागरूक होते जाएंगे, वैसे-वैसे आपके और इनके बीच दूरी बढ़ती जाएगी। देखिए, एक बार अगर दूरी आ गई तो आप बिना शरीर हुए, अपने शरीर का इस्तेमाल कर सकते हैं। आप अपने विचार का इस्तेमाल कर सकते हैं, लेकिन आप विचार नहीं हैं, आप भावुक हो सकते हैं, लेकिन आप भावना नहीं हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि तब आप किस तरह की भावना पैदा करेंगे? सबसे मधुर भावनाएं।
अगर आप सजगता से अपने विचारों का इस्तेमाल करें तो आप किस तरह के विचार पैदा करेंगे? आप ऐसे विचारों को पैदा करेंगे, जो आपके हित में हों या आपके खिलाफ हों? निश्चित रूप से अपने हित से जुड़े विचारों को पैदा करेंगे। ‘अरे सुनने में तो यह बहुत अच्छा लगता है, लेकिन जागरूक हुआ कैसे जाए?’ आप अपने विचारों को देखने की कोशिश कीजिए-एक विचार, दो विचार और फिर खत्म। ज्यादातर लोग दो विचारों से आगे ध्यान नहीं दे पाते। इसलिए साधना की जरूरत पड़ती है, क्योंकि बिना जरूरी ऊर्जा के, जागरूक होने की कोशिश करना बेहद कठिन है।
अगर आप अपने भीतर पर्याप्त ऊर्जा पैदा कर लेते हैं, तो आप देखेंगे कि आपका शरीर यहां बैठा है, आपके विचार कहीं और होंगे, आप कहीं और होंगे, इस तरह से साधना अपना रास्ता खुद बना लेती है। अगर आपकी ऊर्जा, आपकी शारीरिक या मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया से अधिक प्रबल हो जाती है, विचार प्रक्रिया से अधिक तीव्र होती है या आपके भीतर उठ रही भावनाओं से ज्यादा प्रबल हो जाती है तो अचानक आप पाएंगे कि हर चीज यहां अलग-अलग है। अगर आपको यह पता चल जाए कि कौन सी चीज क्या है, तो आप उनको जैसे चाहें, इस्तेमाल कर सकते हैं। अब आप इनका कैसा इस्तेमाल करते हैं, इसके लिए बेशक आपको कौशल की जरूरत होती है।
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