अपने को पहचानें
शरीर अनेक सुख-सुविधाओं का माध्यम है, ज्ञानेन्द्रियों द्वारा रसास्वादन और कम्रेन्द्रियों द्वारा उपार्जन करने वाला शरीर ही सांसारिक हषरेल्लास प्राप्त करता है।
![]() श्रीराम शर्मा आचार्य |
इसलिए इसे स्वस्थ, सुंदर, सुसज्जित व समुन्नत स्थिति में रखना चाहिए। इसी दृष्टि से उत्तम आहार-विहार रखा जाता है, तनिक सा रोग-कष्ट होते ही उपचार कर ली जाती है। शरीर की ज्योति ही मस्तिष्क की उपयोगिता है। आत्मा की चेतना और शरीर की गतिशीलता के भौतिक व आत्मिक समन्वय के प्रतीक हैं, यह मन-मस्तिष्क। इनकी अपनी उपयोगिता है। मन की कल्पना, बुद्धि का निर्णय, चित्त की आकांक्षा और अहंता की प्रवृत्ति, चारों से मिलकर अन्त:करण चतुष्टय बना है। सभ्यता, संस्कृति, शिक्षा, दीक्षा द्वारा मस्तिष्क को विकसित एवं परिष्कृत करने के लिए हमारी चेष्टा निरंतर रहती है क्योंकि भौतिक जगत में उच्चस्तरीय विकास एवं आनंद उसी के माध्यम से संभव है। शरीर को समुन्नत स्थिति में रखने के लिए पौष्टिक आहार, व्यायाम, विनोद, आनंद आदि की अगणित व्यवस्थाएं की गई हैं। मस्तिष्कीय उन्नति के लिए स्कूल, कॉलेज, प्रशिक्षण केंद्र, गोष्ठियां, सभाएं विद्यमान हैं। पुस्तिकाएं, रेडियो, फिल्म आदि का सृजन किया गया है जिससे कि मस्तिष्कीय समर्थता बढ़े। संसार में जो कुछ भी हो रहा है। यहां उसकी निंदा या प्रशंसा नहीं की जा रही है।
ध्यान उस तथ्य की ओर आकषिर्त किया जा रहा है जो इस सबसे अधिक उत्कृष्ट एवं आवश्यक था। यदि इससे ऊपर भी कुछ समझा गया होता तो उसके लिए भी जीवन क्रम में वैसा ही स्थान मिलता, जैसा शरीर और मन के लिए होता है, पर हम देखते हैं वह तीसरी सत्ता जो इन दोनों से लाखों, करोड़ों गुनी अधिक महत्त्वपूर्ण है एक प्रकार से उपेक्षित विस्मृत ही पड़ी है और वह लाभ और आनंद जो अत्यंत सुखद एवं समर्थ है एक प्रकार से अनुपलब्ध ही रहा है। रोज ही कहा और सुना जाता है कि शरीर और मन से ऊपर आत्मा है। सत्संग और स्वाध्याय के नाम पर यह शब्द आये दिन आंखों और कानों के पदरे पर टकराते हैं, पर वह सब एक ऐसी विडंबना बन कर रह जाता है जो मानो कहने-सुनने और पढ़ने-लिखने के लिए ही खड़ी की गई हो। वास्तविकता से जिसका कोई सीधा संबंध न हो। ऐसा न होता तो आत्मा को सचमुच ही महत्त्वपूर्ण माना गया होता।
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