हिमालय दिवस : संजीदा हो सरकार
आज देश के भाल हिमालय का समूचा क्षेत्र संकट में है। इसका प्रमुख कारण इस समूचे क्षेत्र में विकास के नाम पर अंधाधुंध बन रहे अनगिनत बांध, पर्यटन के नाम पर हिमालय को चीर कर बनाई जा रही ऑल वैदर रोड और उससे जुड़ी सड़कें हैं।
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दुख इस बात का है कि हमारे नीति-नियंताओं ने कभी भी इसके दुष्परिणामों के बारे में सोचा तक नहीं। वे आंख बंद कर इस क्षेत्र में पनबिजली परियोजनाओं को और पर्यटन को ही विकास का प्रतीक मानकर उनको स्वीकृति-दर-स्वीकृति प्रदान करते रहे हैं, बिना यह जाने-समझे कि इससे पारिस्थितिकी तंत्र को कितना नुकसान उठाना पड़ेगा।
पर्यावरण प्रभावित होगा वह अलग जिसकी भरपायी असंभव होगी। विडम्बना यह है कि यह सब उस स्थिति में हो रहा है, जबकि दुनिया के वैज्ञानिकों ने इस बात को साबित कर दिया है कि बांध पर्यावरण के लिए भीषण खतरा हैं और दुनिया के दूसरे देश अपने यहां से धीरे-धीरे बांधों को कम करते जा रहे हैं। इसके लिए किसी एक सरकार को दोष देना मुनासिब नहीं होगा। वह चाहे संप्रग सरकार हो या फिर राजग, दोनों में कोई फर्क नहीं है।
जहां तक संप्रग सरकार का सवाल है तो उसने पर्यावरणविदों और गंगा की अस्मिता की रक्षा के लिए किये जा रहे आंदोलनकारियों के दबाव में उत्तराखण्ड में बांधों के निर्माण पर रोक लगा दी थी, लेकिन 2014 में सत्ता परिवर्तन के बाद राजग सरकार ने न केवल बांधों के निर्माण को मंजूरी दी बल्कि इस क्षेत्र में पर्यटन के विकास की खातिर पहाड़ों को काट-काटकर सड़कों के निर्माण को मंजूरी और दे दी। अब सवाल यह है कि यदि यह सिलसिला इसी तरह जारी रहा तो इस पूरे हिमालयी क्षेत्र का पर्यावरण कैसे बचेगा। सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि हमारी सरकार और देश के नीति-नियंता, योजनाकार यह कदापि नहीं सोचते-विचारते कि हिमालय पूरे देश का दायित्व है। वह देश का भाल है, गौरव है, स्वाभिमान है, प्राण है। जीवन के सारे आधार यथा-जल, वायु, मृदा सभी हिमालय की देन हैं। देश की तकरीब 65 फीसद आबादी का आधार हिमालय ही है क्योंकि उसी के प्रताप से वह फलीभूत होती है। और यदि उसी हिमालय की पारिस्थितिकी प्रभावित होती है तो देा प्रभावित हुए बिना नहीं रहेगा। इस सच्चाई को झुठलाया नहीं जा सकता। ऐसे हालात में जरूरत इस बात की है और वैज्ञानिक, पर्यावरणविद और समाजविज्ञानी सभी मानते हैं कि हिमालय की सुरक्षा के लिए सरकार को इस क्षेत्र में जल, जंगल और जमीन को बचाने के लिए पर्वतीय क्षेत्र के विकास के मौजूदा मॉडल को बदलना होगा। उसे बांधों के विस्तार की नीति भी बदलनी होगी। साथ ही पर्यटन के नाम पर सड़कों के लिए पहाड़ों के विना को भी रोकना होगा। क्येंकि बांधों से नदियां तो सूखती ही हैं, इसके पारिस्थितिकीय खतरों से निपटना भी आसान नहीं होता। यदि एक बार नदियां सूखने लगती हैं तो फिर वे हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी। पहाड़ जो हमारी हरित संपदा और पारिस्थितिकी में अहम भूमिका निभाहते हैं, नहीं होंगे तो हमारा वष्रा चक्र प्रभावित हुए बिना नहीं रहेगा, परिणामत: मानव अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। एक समय राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने कहा था कि, ‘हिमालय को प्रदूषण से बचाना आज की सबसे बड़ी चुनौती है। इसलिए इस क्षेत्र में पारिस्थितिकी संरक्षण के लिए काम करने की महती आवश्यकता है। कारण हिमालय पर पारिस्थितिकी का खतरा बढ़ गया है। इस स्थिति में हिमालय पर पर्यावरण संरक्षण के लिए काम करना सबसे बड़ी सेवा है।’
विडम्बना यह कि इस बात को सरकार और उसके समर्थक मानने को कतई तैयार नहीं हैं। लगता है वे विकास के फोबिया से ग्रस्त हैं। उन्हें न पर्यावरण की चिंता है, न मानव जीवन की। इसी स्वार्थी प्रवृत्ति ने हिमालय का सर्वनाश किया। वह चाहे हिमालय के उत्तर-पूर्व हों या पश्चिमी राज्य। हिमालय से निकली नदियों की हमारे देश में हरित और ेत क्रांति में महती भूमिका है। इन्हीं नदियों पर बने बांध देश की ऊर्जा संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं, लेकिन विडम्बना कि उसी हिमालय क्षेत्र के तकरीब 40 से 50 फीसद गांव आज भी अंधेरे में रहने को मजबूर हैं।
यही नहीं तकरीब 60-65 फीसदी देा के लोगों की प्यास बुझाने वाला हिमालय अपने ही लोगों की प्यास बुझाने में असमर्थ है। इसलिए जरूरत इस बात की है कि सत्ता प्रतिष्ठान इस हिमालयी क्षेत्र की पारिस्थितिकी की वजहों के हल तलाशें और ऐसे विकास को तरजीह दें जिनसे पर्यावरण की बुनियाद मजबूत हो। तभी कुछ बदलाव की उम्मीद की जा सकती है।
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