कांग्रेस : उल्टा पड़ सकता है यह दांव

Last Updated 27 Dec 2019 12:41:47 AM IST

यह बात बार-बार स्पष्ट किए जाने के बावजूद कि नागरिकता संशोधन कानून से भारत के किसी भी नागरिक को चाहे उसका मजहब कुछ भी कोई लेना-देना नहीं है, विरोध के नाम पर हिंसा और आगजनी का अपराध हमारे-आपके सामने घटित हो रहा है।


कांग्रेस : उल्टा पड़ सकता है यह दांव

ऐसे समय राजनेताओं का एक ही दायित्व होता है कि सबसे पहले हिंसा की निंदा करे और किसी तरह कानून अपने हाथ में न लेने की अपील जारी करें। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारे देश के नेता ठीक इसके विपरीत भूमिका अदा कर रहे हैं। जब एक ओर दिल्ली के जामा मस्जिद से निकली भीड़ में से कुछ असामाजिक और उपद्रवी तत्व दिल्ली गेट के पास दरियागंज में पुलिस पर पत्थरों से हमला कर रहे थे, गाड़ियां जला रहे थे, तोड़फोड़ कर रहे थे; ठीक उसी समय कांग्रेस नेता सोनिया गांधी ने देश को संबोधित किया। जब उनका संबोधन आरंभ हुआ तो ऐसा लगा कि वो शांति की अपील करेंगी, लेकिन हुआ इसके उलट। प्रश्न है कि इसे हिंसा को रोकने का वक्तव्य कहेंगे या हिंसा को बढ़ाने के लिए उकसाना? आप निष्पक्ष होकर विचार करिए और निष्कर्ष निकालिए।

विपक्ष की नेता होने के कारण सरकार की आलोचना करने में कोई समस्या नहीं है। किंतु आप राजनीति देश के लिए करतीं हैं तो फिर एकता-अखंडता के लिए शांति और सांप्रदायिक सौहार्द आपकी प्राथमिकता होगी। जब कुछ देश विरोधी शक्तियां चारों ओर आग लगा रहीं हों ताकि सांप्रदायिक तनाव पैदा हो उस समय किसी जिम्मेवार नेता का वीडियो संदेश ऐसा नहीं हो सकता। उनके यह कहने में कोई हर्ज नहीं है कि लोकतंत्र में लोगों को सरकार की गलत नीतियों के खिलाफ आवाज उठाने का अधिकार है और सरकार का दायित्व है कि उसको सुने तथा उनकी चिंताओं को दूर करे। किंतु उनका यह कहना सही नहीं है कि सरकार विरोध की आवाज को दबाने के लिए निर्ममतापूर्वक बल का इस्तेमाल कर रही है।
कहीं भी अहिंसक विरोध प्रदर्शन को कुचला नहीं गया। लोगों ने धारा 144 को तोड़कर प्रदर्शन किया तब भी पुलिस ने बल प्रयोग नहीं किया। यहां तक कि जब उन्मादित भीड़ से पत्थर बरस रहे थे, तब भी पुलिस पहले उनसे ऐसा न करने, शांत होने और वापस लाने की ही अपील कर रही थी। जब उपद्रवी तत्वों ने अति कर दी, आगजनी और तोड़फोड़ की तभी पुलिस ने बल प्रयोग किया है। इसे जिस तरह पूरे देश ने देखा, वैसे ही सोनिया गांधी और उनके साथियों ने भी देखा होगा। ऐसे में यह कहना का कि पार्टी छात्रों और जनता के संघर्ष में उनके साथ है अराजक और हिंसक विरोध करने वालों पर क्या हो सकता है? उनका यह कहना कि लोगों का डर वास्तविक और जायज है; वास्तव में नागरिकता कानून एवं एनआरसी को लेकर फैलाए जा रहे भ्रम और गलतफहमी को बल प्रदान करने वाला है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस  भरोसा देती है कि हम आपके मूलभूत अधिकारों और संविधान की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध हैं। तो क्या हिंसक विरोध करने वाले संविधान की रक्षा कर रहे हैं? ऐसी परिस्थिति में चाहे सत्ता में जो भी हो, किसी पार्टी के नेता के इस तरह के वक्तव्य का समर्थन नहीं किया जा सकता। ऐसा करने वाली सोनिया अकेले नहीं हैं। उनके पहले उसी दिन प्रियंका गांधी वाड्रा पत्रकारों से बात करते हुए कह चुकीं थीं कि सरकार निर्दोष छात्रों और युवाओं को मार रही है, पीट रही है। हम छात्रों के विरोध का समर्थन करते हैं।
यहां यह याद दिलाने की आवश्यकता है कि 15 दिसम्बर को जब न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी के अपने घर से वो जा रहीं थीं उस समय तक पत्थरबाजी से लेकर बसें जलाने की घटना घट चुकी थी। उनसे पत्रकारों ने पूछा कि आप इस पर क्या प्रतिक्रिया देंगी? प्रियंका ने गाड़ी का शीशा तक खोलना भी मुनासिब नहीं समझा। उसके बाद वो इंडिया गेट पर कांग्रेस के बड़े नेताओं के साथ धरने पर बैठ गई और कहा कि सरकार नागरिकता कानून का विरोध करने वाले छात्रों पर जुल्म ढा रही है। वहां भी उन्होंने हिंसा की न निंदा की और न हिंसा न करने की अपील की। उनके पहले राहुल गांधी ने बयान दिया था कि नरेन्द्र मोदी और अमित शाह ने पूरे उत्तर पूर्व में आग लगा दिया है। बाद में उन्होंने भी विरोध का समर्थन करते हुए कहा कि इससे पता चलता है कि पूरा देश इसके विरुद्ध है। अब हमें निष्पक्ष होकर कांग्रेस के प्रथम परिवार के तीनों सदस्यों की सोच तथा इनके रवैये पर विचार करना चाहिए। कांग्रेस जिस एनआरसी के लिए छाती पीट रही है और मुसलमानों के खिलाफ बता रही है, उसकी जन्मदाता वही है। असम में कांग्रेस ने ही पहली बार एनआरसी बनाया तथा बाद में राजीव गांधी ने 1985 में समझौता कर दोबारा करने का वचन दिया। कांग्रेस ऐसा न कर सकी तो सर्वोच्च न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ा और असम में प्रक्रिया आरंभ हुई। सोनिया गांधी कह रहीं हैं कि नागरिकता संशोधन कानून भेदभावपूर्ण है और प्रस्तावित एनआरसी गरीबों को ठेस पहुंचाएगी, नोटबंदी की तरह लोगों को अपनी नागरिकता साबित करने के लिए कतारों में लगना होगा।
प्रियंका कह रहीं हैं कि फिर लोगों को कतारों में खड़ा होना होगा। धनी लोग तो पासपोर्ट दिखा देंगे; गरीब क्या दिखाएंगे? कांग्रेस जानती है कि नागरिकता कानून भेदभावपूर्ण नहीं है। विपक्ष के नेता के तौर पर मनमोहन सिंह का राज्य सभा में दिया गया वक्तव्य सामने आ गया है। वह इसी की मांग कर रहे थे। तो  दोहरा चरित्र किसलिए? दूसरे, एनआरसी का प्रारूप आया भी नहीं है। नागरिकों की सूची रखने वाला यह एक सामान्य रजिस्टर होगा, जिसका असम में एनआरसी से कोई संबंध नहीं। कोई एक पहचान पत्र या कुछ नहीं हो तो दूसरे पहचान पत्र वाले की गवाही पर्याप्त होगी। सार्वजनिक वितरण दुकानों से सस्ते राशन के लिए राशन कार्ड, मनरेगा का जॉब कार्ड, मतदाता पहचान पत्र, आधार कार्ड आदि को मिला दे तो भारत के 99 प्रतिशत से ज्यादा लोगों के पास पहचान पत्र है। यदि पहचान पत्र से कांग्रेस को आपत्ति है तो वह मतदान के समय मतदाता पहचान पत्र, बैंकों में खाता के लिए पहचान पत्र, राशन कार्ड, रेलवे आरक्षण के लिए पहचान पत्र आदि सबको खत्म करने की मांग करे। सारे कार्ड की जन्मदाता कांग्रेस ही है।
यह दुखद है कि कांग्रेस सहित कई दलों की भूमिका मुसलमानों के अंदर झूठा भय पैदा करके तनाव और हिंसा को बढ़ावा देने वाला है। कांग्रेस के रणनीतिकारों ने इसे अवसर के रूप में देखा है। लेकिन इसमें खतरा है। नागरिकता कानून को जनता के बहुमत का समर्थन है। एनआरसी के पक्ष में भी वातावरण है। इसके विरोध तथा जिस तरह जेहादी, उपद्रवी एवं अन्य असामाजिक तत्व हिंसा कर रहे हैं, उससे बहुमत का आक्रोश बढ़ रहा है। कहने का तात्पर्य यह कि इस समय कांग्रेस और विपक्ष जितना मोदी सरकार पर हमला कर ले राष्ट्रीय चुनाव में यह खतरनाक दावं उनको उल्टा पड़ जाएगा।

अवधेश कुमार


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