खिलौना : गुणवत्ता भी हो, रचनात्मक भी
हाल में बड़े दिन यानी क्रिसमस का जो त्योहार पूरे हर्षोल्लास से पूरी दुनिया में मनाया गया, उसकी मान्यता का एक पहलू यह है कि इस दिन सैंटा क्लॉज तमाम गरीब बच्चों को उनके पसंदीदा खिलौने और चॉकलेट देते हैं।
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खिलौनों से बच्चों की खुशी का क्या ताल्लुक है-यह बात तमाम अध्ययनों में साफ हुई है। अमीर हो या गरीब, खिलौने पाकर बच्चों में नई उम्मीदों का संचार होता है। महानगरीय अकेलापन झेल रहे बच्चों को खिलौने बड़ा सहारा देते आए हैं, तो गरीब बच्चे भी अपने आसपास की चीजों को खिलौने में तब्दील कर खुशी बटोरते आए हैं।
यूं बच्चों के मनोरंजन के केंद्र में रहे सांप-सीढ़ी, लूडो से लेकर गिल्ली-डंडे जैसे खेल-खिलौने अब परिदृश्य से ओझल हैं। इनकी जगह बिल्डिंग ब्लॉक, कई किस्मों के इलेक्ट्रॉनिक खिलौनों और ट्राइसाइकिल, साइकिल, स्केटर, ट्वॉय कार, बाइक से लेकर ड्रम, डॉल, टेडी बियर आदि ने ले ली है। पर इधर इन खिलौनों के बारे में जो एक नया खुलासा हुआ है, उसने हमारा दिल तोड़ दिया है। यह खुलासा क्वॉलिटी काउंसिल ऑफ इंडिया (क्यूसीआई) की ओर से कराए गए टेस्टिंग सर्वे से हुआ है। इस सर्वे की रिपोर्ट में कहा गया है कि ये खिलौने हमारे देश में स्वास्थ्य की कसौटी पर नाकाम साबित हुए हैं। खास तौर से वे खिलौने जो विदेशों से मंगाए जाते हैं।
पाया गया कि वे सुरक्षा मानकों को पूरा नहीं करते। दिल्ली-एनसीआर के खिलौना बाजारों से उठाए गए सैंपलों में से 67 फीसद खिलौनों की रिपोर्ट निगेटिव आई। सिर्फ 33 प्रतिशत खिलौनों को कसौटी पर खरा पाया गया। इनमें भी प्लॉस्टिक से बने खिलौनों को और भी घातक पाया गया है। करीब 80 फीसद प्लास्टिक के खिलौने मैकेनिकल और फिजिकल सेफ्टी के मामले में फेल हुए। मैकेनिकल आधार पर खराब क्वॉलिटी वाले खिलौने बच्चों की नाजुक त्वचा को नुकसान पहुंचाते हैं। प्लास्टिक के 30 फीसद खिलौनों में भारी धातुओं (हैवी मेटल) जैसे कि लेड (पारा) की उपस्थिति दर्ज की गई जो कैंसर का प्रमुख कारक है। इसी तरह टेडी बियर जैसे 45 फीसद सॉफ्ट टॉयज में हानिकारक केमिकल (पैथालेट्स) की मौजूदगी पाई गई है। 75 प्रतिशत इलेक्ट्रिक खिलौनों की रिपोर्ट भी नकारात्मक आई है। यूं तो ज्यादातर खिलौने चीन से आते हैं, पर हांगकांग, जर्मनी, मलेशिया, श्रीलंका और अमेरिका से भी हमारे देश में खिलौने आयात किए जाते हैं। लेकिन क्वॉलिटी के पैमाने पर ज्यादातर में खामियां मिलने के बाद वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने आयातित खिलौनों के खिलाफ की सख्त कदम उठाने की बात कही है। दावा किया जा रहा है कि खिलौनों की खेप आधारित जांच अनिवार्य की जा सकती है। देश में केवल अच्छी क्वॉलिटी के खिलौनों का आयात पक्का करने के लिए हर खेप में से अपनी इच्छा से कोई भी सैंपल ले लिया जाएगा और जांच एवं मंजूरी के लिए उसे मान्यता-प्राप्त लैब भेज दिया जाएगा। यदि सैंपल जरूरी मानदंडों पर खरा नहीं उतरेगा तो वह खेप या तो वापस भेज दी जाएगी या फिर उसे नष्ट कर दिया जाएगा। ऐसे खिलौनों को नष्ट करने के खर्च की वसूली आयातक से की जाएगी। साथ ही, नियमों का उल्लंघन न्यूनतम स्तर पर लाने के लिए खिलौनों की परिभाषा स्पष्ट की जाएगी। घरेलू बाजार में सस्ते और घटिया खिलौनों की बाढ़ रोकने में क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर एक प्रभावी तरीका साबित हो सकता है। चूंकि देश में बिकने वाले लगभग 85 प्रतिशत खिलौने आयातित होते हैं, इसलिए बहुत मुमकिन है कि बाजार में कुछ समय के लिए खिलौनों की कमी हो जाए। खिलौने बाजार से गायब हो जाएं या वे बच्चों की सेहत से खिलवाड़ करें, तो ये दोनों ही खबरें हमारा दिल तोड़ने वाली हैं।
इससे कई सवाल भी उठते हैं। जैसे आखिर क्या वजह है कि देश के भीतर ही अच्छी क्वॉलिटी के खिलौने बनाने वाली इंडस्ट्री क्यों नहीं बन पाई। कहीं इसकी वजह यह तो नहीं कि खिलौनों को लेकर हम बच्चों की जरूरतों का सही आकलन नहीं कर पाए हैं। या फिर हम उन पर ऐसे खिलौने थोपने लगे हैं, जिनकी उन्हें न तो जरूरत हैं और न ही उनमें बच्चों की दिलचस्पी है। हो सकता है कि बच्चे सांप-सीढ़ी, लूडो या टेडी बियर या सामान्य गुड़िया (डॉल्स) से ही खुश हो जाते हों, लेकिन हम उन्हें जबर्दस्ती या देखा-देखी कई किस्म के इलेक्ट्रॉनिक विदेशी खिलौने लाकर देते हैं। ऐसे खिलौने जो बच्चों में सामूहिकता की भावना जगाएं, उन्हें सृजनात्मक नजरिया दें और उनकी बहुमुखी प्रतिभा जगाएं, ऐसे खिलौनों की महत्ता हमेशा रही है और आगे भी रहेगी। अच्छा हो कि इनमें देसी खिलौनों को प्राथमिकता मिले और भारतीय उद्योग ही अच्छी क्वॉलिटी वाले खिलौने बाजार में उतारने की पहल करें।
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