मेडीक्लेम पॉलिसी : चतुराई से बाज आएं कंपनियां
बॉम्बे हाई कोर्ट ने मेडीक्लेम पॉलिसी को लेकर बीमाधारकों के हित में महत्त्वपूर्ण फैसला दिया है। अदालत ने कहा है कि किसी व्यक्ति को मेडीक्लेम पॉलिसी के तहत मिलने वाली राशि को मोटर वाहन अधिनियम के चिकित्सा व्यय के मुआवजे से नहीं काटा जा सकता।
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पीठ ने कहा कि मेडीक्लेम पॉलिसी के तहत दावेदार द्वारा प्राप्त किसी भी राशि की कटौती स्वीकार्य नहीं होगी। पीठ ने सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा, मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण को न केवल उचित मुआवजा दिलवाने का अधिकार है, बल्कि यह उसका कर्त्तव्य भी है।
अदालत ने कहा कि मृतक द्वारा किए गए दूरदर्शितापूर्ण वित्तीय निवेश का लाभ अपराधी नहीं उठा सकता। मामले में बीमा कंपनी का दावा था कि चिकित्सा व्यय भी मेडीक्लेम पॉलिसी के हिस्से के रूप में प्राप्त बीमा राशि के अंतर्गत आता है। यह तर्क बेहद दुखद है कि बीमाकर्ता का कोई नुकसान नहीं हुआ। हालांकि अपने देश में अभी भी बीमा कराने के प्रति लोग ज्यादा जागरूक नहीं हैं। मगर वाहन बीमा सड़क पर निकले चालक के लिए काफी सुविधाजनक व्यवस्था साबित हो रही है।
30% आबादी अभी भी स्वास्थ्य बीमा से वंचित बताई जाती है। उक्त मामले में यदि बीमाधारक द्वारा दोनों तरह का बीमा लिया गया था तो उसे दोनों का लाभ मिलना उचित कहा जाना चाहिए। स्वास्थ्य बीमा और वाहन बीमा के लिए वह अलग-अलग प्रीमियम का भुगतान कर रहा है तो उसके अधिकार से वंचित किया जाना कंपनियों की नीयत में खोट दर्शाता है। बीमा कंपनियां अभी भी धारकों को मुआवजा देने में भारी कोताही करती पाई जाती हैं।
तमाम नियम-कायदों के बावजूद वन-विंडो प्रणाली संभव होती नहीं नजर आती। बीमा कंपनियों में सार्वजनिक के साथ ही निजी क्षेत्र भी शामिल है। बावजूद इसके बीमाधारकों से किए वादों को पूरा करने में विभिन्न अड़चनें लगाई जाती हैं। कंपनियों का मानना है कि उनके समक्ष भी तमाम समस्याएं हैं।
बीमाधारकों द्वारा गैर-वाजिब, झूठे या गलत तरीके से किए गए दावों से भी वे त्रस्त रहती हैं। मगर यह मामला काफी अलग है जिसमें बीमा कंपनियों ने मुआवजे के लाभकर्ता के प्रति न केवल अमानवीय रवैया रखा, बल्कि उचित लाभ देने में कटौती का प्रयास भी प्रयास किया। अदालत को इन पर आर्थिक दंड लगाना चाहिए ताकि भविष्य में वे बीमाधारकों के साथ चतुराई करने से बाज आएं।
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