आनंद
आनंद को किसी योग्यता की तरह मत देखिए। अगर यह जीवन समृद्ध होना है तो यह उसके लिए एक मूल माहौल है।
![]() जग्गी वासुदेव |
यदि वृक्षों को बढ़ना है और उन पर फल-फूल आने हैं तो हमें मिट्टी को उपजाऊ रखना होगा। यह एक मूल आवश्यकता है। इसी तरह, सिर्फ यदि आप एक सुखद, खुशनुमा अनुभव की अवस्था में हैं तो ही आप बड़ी चीजें खोज पाएंगे अन्यथा आप हर समय अपने लिए सीमाएं बनाने का ही प्रयत्न कर रहे हैं।
आप सिर्फ छोटी चीजें करना चाहते हैं, उसके आगे कुछ भी नहीं। जब आप के अंदर पीड़ा है तो कुछ भी बड़ा नहीं खोजेंगे। जब तक आप सिर्फ पीड़ा बनाने के योग्य हैं तब तक आप अपने आप को अपंग बना रहे हैं। पीड़ा का डर आप को सीमित रखेगा,‘क्या होगा’? पर,‘कुछ भी हो, मैं बस जानना चाहता हूं-इस तरह का पागलपन होने के लिए यह जरूरी है कि आप भरे-पूरे हों, जीवंत हों। इसको वे लोग पागलपन कहते हैं जो जड़बुद्धि हैं पर सिर्फ ऐसे पागल लोगों के कारण ही विज्ञान, साहसी कार्य, भूगोल आदि संभव हुए हैं।
इस धरती पर भूगोल की खोज, अंतरिक्ष का ज्ञान, हर तरह की तकनीकें, ये सब इसलिए घटित हुई क्योंकि कोई ऐसा था, जो अपने आराम को छोड़ने के लिए तैयार था। ऐसे लोग कष्ट भोगने के लिए तैयार थे, क्योंकि वे अपने अस्तित्व की सीमाओं से परे को जानने की पूर्णता और उससे मिलने वाले परमानंद को पाना चाहते थे। उतनी भूख आप के भीतर तभी आ सकती है जब आप कुछ वर्षो तक स्वाभाविक आनंदपूर्ण अवस्था में रहें और समझें कि वास्तव में आप चाहे जो कर रहे हों-छोटी चीजें, जिनके बारे में लोग इतना बड़ा हौवा खड़ा कर रहे हैं, जैसे नौकरी पाना, काम करना, घर बनाना, शादी करना, दो बच्चे पैदा करना-ये सब कोई बड़ी उपलब्धियां नहीं हैं। सभी प्राणी यही कर रहे हैं।
एक चिड़िया भी घोंसला बनाती है, अंडे देती है, बच्चों का पालन करती है, उन्हें खिलाती है, बड़ा करती है और फिर 15 दिनों में वे उड़ जाते हैं। आप इसके बारे में इतना बड़ा नाटक करते हैं। मानवता के इतिहास में पहली बार आज हमारे जीवित रहने की प्रक्रिया इतनी व्यवस्थित है, जितनी पहले कभी नहीं थी। तो अब यह समय रहस्यवाद के लिए है। यह वो समय है, जब लोगों को अपनी सीमाओं से बाहर आ कर, इसके परे क्या है, उसकी खोज करनी चाहिए।
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