बीमारी
ध्यान रखना, सवाल है : उसे ऐसा प्रतीत नहीं होता कि यह बीमारी में हूं या मैं बीमार हूं। बीमारी तो आती है; जैसे तुम्हें आती है, उसे भी आती है।
![]() आचार्य रजनीश ओशो |
अरे, जब भूख आती है, प्यास आती है; जवानी आती है, बुढ़ापा आता है, तो बीमारी न आएगी? बीमारी भी आएगी, बुढ़ापा भी आएगा और मृत्यु भी आएगी। मगर तीर्थकर को जरा भी प्रभावित नहीं करती। ‘तीर्थकर अछूता रह जाता है, अस्पर्शित रह जाता है।
यह तो बात समझ में आने की है। लेकिन यह बात मूढ़तापूर्ण हो जाती है जब तुम कहने लगते हो : बीमारी ही नहीं आती है। फिर: तुम्हें न मालूम क्या-क्या कहानियां गढ़नी पड़ती हैं। झूठी कहानियां! एक झूठ को बचाने के लिए हजार झूठ गढ़ने पड़ते हैं। तो यह कहानी गढ़नी पड़ी है जैनों को। क्योंकि इस बात को झुठलाएं कैसे कि छह महीने महावीर पेचिश की बीमारी से परेशान रहे? अब इस बात को छिपाएं कैसे? छह महीने उनको दस्त ही लगते रहे। इसी में उनकी मृत्यु हुई। तो कहानी गढ़नी पड़ी।
कहानी गढ़ी कि गोशालक ने उनके ऊपर तेजोलेश्या छोड़ी। गोशालक ने जादू किया, काला जादू। जैन शास्त्रों में उसका नाम है तेजोलेश्या। उसने अपना सारा क्रोध, अपनी क्रोधाग्नि उनके ऊपर फेंक दी। और करुणावश वह उस क्रोधाग्नि को पचा गए क्योंकि वापस भेजें तो गोशालक मर जाएगा।
गोशालक न मरे, इसलिए वे पी गए उस तेजोलेश्या को, उस काले जादू को। स्वभावत: जब काला जादू पीया, तो पेट खराब हो गया। अब क्या कहानी गढ़नी पड़ी! सीधी सादी बात है ‘कि पेट को बीमारी थी’। इसमें बिचारे गोशालक को फंसाते हो, तेजोलेश्या की कहानी गढ़ते हो, करुणा दिखलाते हो और तुम कहते हो कि तीर्थकर सर्वशक्तिशाली होता है। तो तेजोलेश्या को पचाते तो पूरा ही पचा जाना था, फिर क्या पेट खराब करना था। पचा ही जाता पूरा। फिर पेट कैसे खराब हुआ? पचा नहीं पाया। नहीं तो पेट खराब नहीं होना था।
पची नहीं तेजोलेश्या। शरीर के अपने नियम हैं। अपना गणित है। शरीर प्रकृति का हिस्सा है। और प्रकृति कोई अपवाद नहीं करती। तो जो परिणाम होना था, वह हुआ। मृत्यु उससे फलित हुई। मृत्यु भी होती है, बीमारी भी होती है, बुढ़ापा भी होता है। फिर जो भी साक्षीभाव को उपलब्ध हो गया है, वह सिर्फ देखता रहता है, उसका कहीं भी ऐसा तालमेल नहीं बैठ जाता कि मैं बीमार हूं। यह बात उठती नहीं, यह बात जुड़ती नहीं उसके भीतर। इसलिए बीमारी के बीच भी वह परम स्वस्थ होता है।
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