मीडिया और बाढ़

Last Updated 16 Jul 2023 01:29:20 PM IST

सबको मालूम था कि बरसात के महीनों में बारिशें होंगी ही। मालूम था कि दिल्ली में फिर जमुना कुछ उफनाएगी ही और ज्यादा उफनाएगी तो उसका पानी सड़कों पर आएगा ही और सबको यह भी मालूम था कि एक मामूली सी बाढ़ के लिए सभी दल एक दूसरे को जिम्मेदार ठहराएंगे ही।


मीडिया और बाढ़

एक कहेगा कि वो तो दिल्ली को ‘पेरिस’ बनाना चाहता था लेकिन बना दिया ‘वेनिस’, कि जमुना की कीचड़ अब तक नहीं निकाली गई, कि दिल्ली भी क्या करे, कि हरियाणा हर बरसात में ‘हथिनी कुंड बैराज’ से पानी छोड़ता है जो दिल्ली की ओर आता ही है और दिल्ली डूब जाती है। फिर, अपने चैनल भी ‘बाढ़’ को कुछ इस तरह से दिखाते हैं मानो ‘साक्षात पल्रय’ हो। यह भी मालूम था कि यमुना के खतरे के निशान से ऊपर आते ही  दलीय नेता रिपोर्टरों के पास पहुंच जाएंगे या रिपोर्टर उनके पास पहुंच जाएंगे और फिर बाढ़ के समानांतर एक दूसरे पर ‘दोषारोपणों की बाढ़’ आ जाएगी कि ये जिम्मेदार कि वो! मीडिया के इस अति-स्पर्धात्मक जमाने में हर चैनल, एंकर, रिपोर्टर सब बाढ़ को कुछ इस तरह से दिखाते हैं जैसे ऐसा पहले कभी न हुआ हो। उनके रिपोर्टर पानी में उतर कर जोखिम लेने के अपने साहस का प्रदर्शन करते दिखेंगे कि देखो, यहां कितना तेज बहाव है, कि यहां बसें तक डूब गई हैं। हमारा मीडिया हर संकट को हमेशा ‘अतिरंजनात्मक भाषा’ में किसी ‘विडंबना’ की तरह ही दिखाता है। कभी किसी को दो टूक तरीके से जिम्मेदार नहीं ठहराता, और जैसे ही नेताओं के पास जाता है, वे ऐसे हर संकट को ‘फुटबॉल’ बनाकर खेलते रहते हैं। अपना मीडिया हर संकट को इसी तरह निपटाता है।

कहने की जरूरत नहीं कि हर संकट का ऐसा ‘ट्रीटमेंट’ हमें उसका और अधिक आदी बनाकर और अधिक बेशर्म बनाकर छोड़ जाता है। हम फिर ‘अगले संकट’ का इंतजार करने लगते हैं। संकट से सीखने की जगह हमारे नेता और शासक-प्रशासक हर संकट को भगवान भरोसे छोड़ देते हैं और मीडिया भी यही करता है। दल राजनीति करने लगते हैं, तो मीडिया भी उस राजनीति को ‘प्रश्रय’ देने लगता है। अपना हर संकट इसी तरह से निपटता है। हमारा मीडिया भी उसे इसी तरह निपटाता है। दिल्ली यूं भी एक ‘असंभव शहर’ है और अपना मीडिया भी इस ‘असंभव शहर’ को ‘संभव शहर’ बनाने के चक्कर में लगा रहता है। इसी प्रक्रिया में मीडिया अक्सर अपने को ‘जनता के पक्षधर’ की तरह दिखाने लगता है, और बताता रहता

है कि जनता परेशान है, नेता राजनीति कर रहे हैं, और फिर निष्कर्ष निकाल देता है कि देश का अब कुछ नहीं हो सकता। इस तरह अपनी ‘अवसरवादी राजनीति’ को भी छिपा लेता है।
बहरहाल, इस बार की बाढ़ ने मीडिया को आज से पैंतालीस बरस पहले यानी 1978 में आई बाढ़ की याद दिला दी। लेकिन तब न इतना स्पर्धात्मक मीडिया था, न इतने कंपटीटिव चैनल थे।  अखबार थे, रेडियो था और ‘ब्लेक एंड व्हाइट दूरदर्शन’ था जो अपने सीमित खबर बुलेटिनों से रिपोर्ट दिया करता था। तब ‘लाइव प्रसारण’ भी शायद नहीं था। इसीलिए तब न इतने नेता थे, न इतने दोषारोपण थे, न इतनी कलह थी। सरकारी होने के नाते उसमें जो भी दिखता था वह पूर्व संपादित होता था। इसलिए तब न इतने ‘अतिरंजनात्मक’ और ‘भावुक’ रिपोर्ताज  थे, जितने आज हैं।

तब जमुना में जो बाढ़ आई वो वजीरपुर, मॉडल टाउन और ‘आउटर रिंग रोड’ (जो तब नहीं थी) के निचले इलाकों को डुबाती चली गई थी। पानी कई दिन तक नहीं उतरा था। उत्तर पश्चिमी दिल्ली व पूर्वी दिल्ली के कुछ इलाके जलमग्न हो गए थे। लेकिन तब न इतनी ‘निष्ठुर’ राजनीति थी, न   दोषारोपण करने वाले थे। सिर्फ वॉलंटियर्स और सेना थी जो अब की तरह तब भी सक्रिय थी। लेकिन अब जब सब कुछ है, बाढ़ भी कमतर है, तब भी उसे खतरनाक और दिल्ली के डूबने को इस तरह  बताया जा रहा है, जैसे कोई ‘अनहोनी’ हुई हो। बाढ़ बाढ़ है। अमेरिका में भी आती है लेकिन वहां जिस तरह से प्रशासन बहसों में पड़ने की जगह परेशानी दूर करने में लग जाता है, अपने यहां ऐसा नहीं होता क्योंकि कोई किसी संकट से नहीं सीखता। अपने यहां हर संकट यदि हर दल के लिए एक ‘अवसर’ होता है, तो मीडिया के लिए भी टीआरपी बढ़ाने का एक अवसर ही होता है। यही हो रहा है।

सुधीश पचौरी


Post You May Like..!!

Latest News

Entertainment