बिहार में शराबबंदी : नीतीश का सियासी रकबा बढ़ा
सार्वजनिक जीवन में नैतिक शुचिता और पारदर्शिता बड़ी दरकार है। इस मूल्यबोध की समझ दुनिया में चाहे जब बनी-बिगड़ी हो भारत में राष्ट्रीय आंदोलन के दिनों से इसे महत्त्व मिला।
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महात्मा गांधी के नेतृत्व में स्वाधीनता आंदोलन की तो कसौटी ही यह रही कि इसने अहिंसक मूल्य-निष्ठा को सर्वोपरि माना। 1917 में गांधी जब चंपारण में नील किसानों पर जुल्म के खिलाफ सत्याग्रह की सैद्धांतिकी का जमीनी परीक्षण कर रहे थे, तब उन्होंने कहा था कि बिहार की धरती पर उन्हें अहिंसा देवी के दर्शन हुए। दर्शन का यह बोध जहां आगे चल कर उनके नेतृत्व में चले स्वाधीनता संघर्ष में दिखा वहीं सेवा से जुड़े रचनात्मक कार्यक्रमों को लेकर भी उन्होंने एक गंभीर तकाजे को देश-समाज के सामने रखा।
दुर्भाग्य रहा देश का कि आजादी के करीब आते-आते ये सारे बोध और तकाजे कमजोर पड़ते गए। आजाद भारत में अहिंसक मूल्य-निष्ठा की आखिरी गूंज बिहार आंदोलन के दौरान सुनाई पड़ी। लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में आरंभ हुए आंदोलन की नाटकीय राजनीतिक परिणिति की चर्चा आज खूब होती है, पर ज्यादा जरूरी है यह समझना कि इस आंदोलन की वैचारिकी जेपी ने क्या तय की थी। कांग्रेस की समाजवादी धारा के पुरोधा रहे जेपी के मन में गांधी को लेकर असंदिग्ध आस्था थी। इसलिए जब संपूर्ण क्रांति की अलख के साथ वे सड़कों पर उतरे तो उन्होंने अपने साथ चल रही जमात के सामने अहिंसक मूल्य-निष्ठा की कसौटी सबसे पहले रखी।
यह और बात है कि आपातकाल की घोषणा के बाद संपूर्ण क्रांति सीधे-सीधे लोकतंत्र और संविधान को बचाने की फौरी लड़ाई के रूप में तब्दील हुई और देश में प्रचलित राजनीतिक संस्कृति में बदलाव की मुराद दम तोड़ गई। इतिहास का यह भी दिलचस्प चक्र है कि आज बिहार सत्ता और राजनीति में ऐसे ही कुछ अहिंसक मूल्यों को लेकर फिर से चर्चा में है। बिहार में शराबबंदी के नौ वर्ष पूरे हो रहे हैं। राज्य में शराबबंदी का फैसला ऐसा है, जो राजनीतिक नफा-नुकसान को छोड़कर इस निर्णय को लेने के नीतीश कुमार के नैतिक साहस को तारीखी अहमियत देता है।
यह अहमियत तब ज्यादा समझ में आती है जब हम देखते हैं कि एक तरफ दिल्ली के मुख्यमंत्री के पद पर बैठा व्यक्ति शराब घोटाले में जेल की हवा खाता है, तो वहीं अपने राज्य में शराबबंदी का फैसला लेने वाला राजनेता नौ साल बाद भी अपनी नैतिकता पर कायम है। गांधी की वैचारिक चेतना और दृष्टि में मद्य निषेध को लेकर एक गंभीर आग्रह रहा है। आज आजादी के इतने समय बाद इस तरह के किसी नैतिक जोर या संकल्प की बात बेमानी लगती है। खास तौर पर बीते कुछ दशकों में समय और समाज ने जिस जीवन-दृष्टि को तेजी से अंगीकार किया है, उसमें न तो निजी और न ही सार्वजनिक जीवन में किसी नैतिक दरकार के लिए जगह छोड़ी है। सभ्यता और संस्कृति के इतिहास में यह एक ऐसा दौर है, जिसके नैतिक पराभव ने मनुष्य को विश्व युद्ध के बाद एक नई अधोगति तब पहुंचा दिया है।
बहरहाल, बात अकेले शराबबंदी की करें तो इस फैसले का नैतिक के साथ सामाजिक आधार काफी बड़ा है। बिहार में नीतीश कुमार के इस बड़े फैसले की नींव उस संवाद से पड़ी जब वे जीविका दीदियों से बात कर रहे थे। नीतीश भारतीय राजनीति में उस समाजवादी परंपरा से आते हैं, जिसने अपने वैचारिक तेज को जहां सामाजिक-राजनीतिक स्तर पर नई वैचारिकी में ढाला, वहीं गांधी के अहिंसावादी विचारबोध को भी समान रूप से अपनाया। शराबबंदी लागू करने के उनके फैसले को इस लिहाज से देखें-समझें तो इसका सिरा सीधे समाज में महिलाओं की स्थिति में सुधार से जुड़ता है। बिहार ने देश और दुनिया के आगे सुशासन का वह मॉडल रखा है, जिसमें महिलाएं न सिर्फ आत्मविश्वास से भरी हैं, बल्कि शिक्षा और स्वावलंबन के क्षेत्र में भी तेजी से आगे बढ़ रही हैं। शराबबंदी का फैसला इस बदलाव के रकबे को और बढ़ा देता है। गौरतलब है कि नीतीश सरकार ने बिहार में शराबबंदी का फैसला अप्रैल, 2016 में जरूर लिया पर इससे पहले महिला सशक्तीकरण के लिहाज से कई बड़े फैसले ले चुके थे। 2006 में बिहार में पंचायती राज संस्थाओं में 50 प्रतिशत आरक्षण दिया गया। तब ऐसा करने वाला बिहार देश का पहला राज्य था। 2006 में ही बिहार सरकार ने प्रारंभिक शिक्षक नियुक्ति में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण देने का ऐतिहासिक निर्णय लिया।
इसी तरह 2007 से नगर निकायों में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण मिला। 2013 से बिहार पुलिस में महिलाओं को 35 प्रतिशत आरक्षण का मार्ग प्रशस्त हुआ। प्रदेश में महिलाओं के बीच बहाल हुए आत्मविश्वास का नतीजा है कि बिहार आज सबसे ज्यादा 10.81 लाख स्वयंसहायता समूह बना कर देश में पहले स्थान पर है। इससे 1.35 करोड़ से अधिक महिलाएं आत्मनिर्भर बनी हैं। बिहार में नौ वर्षो से लागू शराबबंदी की सफलता के नैतिक और सामाजिक मूल्यांकन करते हुए जान लेना जरूरी है कि इस फैसले के प्रशासनिक पेचोखम भी कम नहीं हैं। इसलिए चुनावी मौसम में इस फैसले को हटाने तक की अनैतिक पराकाष्ठा तक कई सियासी जमातें पहुंच जाती हैं। बात करें पूरे देश की तो 1960 में बॉम्बे से अलग होकर जब गुजरात बना तभी से वहां शराबबंदी लागू है। पूर्वोत्तर के कई राज्यों में भी शराबबंदी है। अलबत्ता, मणिपुर से हरियाणा तक ऐसे कई प्रदेश भी हैं, जो इस बड़े फैसले पर अटल नहीं रह सके। आज जब भारत सॉफ्ट पावर के तौर पर दुनिया में अपनी चमक बिखेर रहा है तो इस नैतिक और सांस्कृतिक मूल्य-निष्ठा पर ज्यादा गंभीर होने की जरूरत है।
आखिरकार, शराबबंदी का फैसला महज नैतिक फैसला भर नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव का बड़ा आधार भी है। याद रहे कि हमारे संविधान में भी इस बात पर जोर दिया गया है। संविधान के अनुच्छेद 47 में राज्य नीति-निर्देशक सिद्धांतों में कहा गया है कि राज्य को मादक पेय पदाथरे और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक पदाथरे के सेवन पर प्रतिबंध लगाने का प्रयास करना चाहिए। ऐसे में कह सकते हैं कि बिहार में शराबबंदी के नौ वर्ष मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ संवैधानिक दरकार पर भी खरा उतरने की बड़ी मिसाल हैं।
(लेख में व्यक्त विचार निजी है)
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