पसमांदा के हित में
उम्मीद विधेयक राज्य सभा से भी पारित हो गया और अब इसके विधिवत कानून बनने में राष्ट्रपति के हस्ताक्षर की औपचारिकता भर रह गई है।
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इस पर करीब 13 घंटे की लंबी बहस राज्य सभा में भी हुई। सरकारी पक्ष ने अपने उन्हीं तकरे को और अधिक वजनदारी के साथ आगे बढ़ाया जो उसने लोक सभा में रखे थे। यहां उम्मीद थी कि विपक्ष के खामियों का समुचित जवाब देंगे जो खामियां इस विधेयक को लाने का कारण बनी, लेकिन मुस्लिम वक्ताओं के साथ-साथ विपक्षी वक्ता भी इसे असंवैधानिक बताते रहे।
यानी वे मुसलमान के इसी तर्क की पुष्टि करते रहे कि वक्फ बोर्ड अल्लाह के लिए है, इस्लामी कानून के तहत है, शरीयत की विधियों से संचालित है। इसलिए इसमें दुनियावी दखलअंदाजी बर्दाश्त नहीं की जा सकती। इस बहस ने कथित धर्मनिरपेक्षता का वह चेहरा फिर से उजागर कर दिया कि इस्लामी विधियों और प्रावधानों के साथ खड़े होना, भले ही वह आधुनिक युग में कितने भी निर्थक क्यों ना हो गई हो, धर्मनिरपेक्षता है।
यह धर्मनिरपेक्षता अंतत: उन्हें कहां ले जाएगी यह तो भविष्य बताएगा, लेकिन हाल-फिलहाल इसकी बुरी तरह पराजय हुई है। विपक्ष अगर सचमुच इस मामले में अपनी साख बचाना चाहता है तो उसे यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि वक्फ कानून नये संशोधनों के साथ अस्तित्व में आ गया है।
अब उसको ध्यान इस पर केंद्रित करना चाहिए कि इस नये कानून के आलोक में वक्फ बोर्ड भू-माफियाओं और निजी लाभ को पाने वाले स्वार्थी समूह की गिरफ्त से बाहर आए और उसका लाभ मुसलमान तक पहुंचे जो उसके वास्तविक हकदार हैं। विपक्ष को मुल्ला, मौलानाओं और मुसलमान की राजनीति करने वाले राजनेताओं का मोह त्याग कर पसमांदा और सबसे निचली पायदान पर खड़े मुसलमानों के हित की वास्तविक लड़ाई लड़नी चाहिए।
ध्यान रखना चाहिए कि मुस्लिम राजनीति गरीब मुसलमानों की आंख पर पट्टी बांधकर उनका दोहन, शोषण करती रही है और उन्हें अपने राजनीतिक हितों का मोहरा बनती रही है। इन मुसलमानों को कट्टरपंथी और स्वार्थी समूहों के चंगुल से बाहर निकलना समय की मांग है। उम्मीद की जानी चाहिए कि विपक्ष इस मांग को सुनेगा और अपनी मौजूदा नीति से बाहर निकाल कर निम्नवर्गीय मुसलमानों के हित में संघर्ष करेगा।
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