संबंधों में सुधार के संकेत
आजकल कूटनीतिक जगत में भारत-चीन संबंधों में सुधार को लेकर काफी चर्चा है। 2020 में लद्दाख की गलवान घाटी में हुए घटनाक्रम के बाद पिछले वर्ष अक्टूबर में रूस में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच मुलाकात हुई थी।
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इस बैठक में दोनों शीर्ष नेताओं ने सीमा पर तनाव कम करने और द्विपक्षीय संबंधों को पटरी पर लाने का प्रयास किया था। विवाद के कुछ क्षेत्रों से सैनिकों की वापसी जरूर हुई लेकिन अन्य मामलों में प्रगति नहीं हुई। इधर, अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के दूसरी बार राष्ट्रपति बनने के बाद दुनिया में बहुत तेजी से बदलाव हो रहे हैं। ट्रंप प्रशासन के फैसलों से अमेरिका की घरेलू राजनीति और अंतरराष्ट्रीय राजनीति का नक्शा बदल रहा है।
अमेरिका और यूरोपीय देशों के बीच तनातनी बढ़ रही है तो दूसरी ओर राष्ट्रपति ट्रंप और राष्ट्रपति पुतिन के बीच जुगलबंदी आकार ले रही है। इस बदलते अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में भारत और चीन ने कुछ लचीला रुख अपनाया है जिससे आशा बंधती है कि द्विपक्षीय संबंध पटरी पर आ सकते हैं। एक अप्रैल, 1950 को दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संबंध हुआ था।
मंगलवार को नई दिल्ली और बीजिंग के कूटनीतिक रिश्तों के 75 वर्ष पूरे होने पर दोनों देशों के राष्ट्रपतियों के बीच शुभकामनाओं और पारस्परिक रिश्तों को और बेहतर बनाने के संदेशों का आदान-प्रदान हुआ।
राष्ट्रपति जिनपिंग ने भारतीय राष्ट्रपति द्रोपदी मुमरु को प्रेषित अपने संदेश में दोनों देशों के रिश्तों के द्योतक ड्रैगन और हाथी के बीच बेहतर तालमेल बनाने की बात की जबकि राष्ट्रपति मुमरु ने कहा कि भारत और चीन के बीच स्थाई, स्थिर और सौहार्दपूर्ण संबंध का फायदा नई दिल्ली और बीजिंग के अलावा पूरी दुनिया को मिलेगा।
वैश्विक मामलों के जानकार किशोर मेहबुबानी का विश्वास है कि अतीत की तरह दोनों देशों के सामने फिर से दुनिया का सिरमौर बनने का अवसर है। लेकिन दोनों ने आपसी संघर्ष का रास्ता अख्तियार किया तो वे यह अवसर गंवा सकते हैं।
वास्तव में यह दावा तो कोई नहीं कर सकता कि हाल-फिलहाल भारत और चीन की समस्याओं का स्थायी समाधान हो जाएगा लेकिन दोनों देश जिस रास्ते पर चल रहे हैं, उससे यह आशा जरूर बंधती है कि भविष्य में सैन्य संघर्ष की स्थिति नहीं बनेगी।
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