भारतीय संविधान में धर्म आधारित आरक्षण स्वीकार्य नहीं

Last Updated 25 Mar 2025 12:21:08 PM IST

मुसलमानों को सरकारी ठेकों में चार फीसद आरक्षण देने के के कर्नाटक सरकार के फैसले का राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने विरोध किया है।


भारतीय संविधान में धर्म आधारित आरक्षण स्वीकार्य नहीं

संघ के महासचिव दत्तात्रेय होसबोले ने कहा भारतीय संविधान में धर्म आधारित आरक्षण स्वीकार्य नहीं है, जिसे भीमराव अंबेडकर ने तैयार किया था। संघ का निर्णय लेने वाली सर्वोच्च संस्था अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक के समापन के अवसर पर होसबोले ने कहा, ऐसा करने वाला कोई भी व्यक्ति हमारे संविधान निर्माता के खिलाफ जा रहा है।

उन्होंने दोहराया कि पूर्व में अविभाजित आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र की तरफ से किए गए मुसलमानों के लिए आरक्षण के प्रयासों को उच्च न्यायालयों व उच्चतम न्यायालय ने खारिज कर दिया था।

महाराष्ट्र में औरंगजेब की कब्र को लेकर उठे विवाद पर उन्होंने कहा औरंगजेब का महिमामंडन किया गया, उसका भाई दारा शिकोह का नहीं, जो सामाजिक सद्भाव में विश्वास रखने वाला शख्स था।

भारत के मूल्यों के खिलाफ जाने वाले लोगों को आदर्श बनाने की बात करते हुए उन्होंने महाराणा प्रताप की सराहना की। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को केवल संघ की उपलब्धि न मानते हुए, उन्होंने इसे पूरे हिन्दू समाज की उपलब्धि बताया।

हिन्दू संस्कृति व हिन्दू एकता के नाम पर वह अपनी विचारधारा पर जोर देते रहते हैं। गैर-राजनीतिक होने के बावजूद संघ के सदस्य राजनीति में सक्रिय रहते हैं। मौजूदा सरसंघचालक मोहन भागवत कहते हैं, संघ कार्य प्रणाली है और वह व्यक्ति निर्माण करती है।

मगर मौजूदा राजनीति व मोदी सरकार पर संघ की विचारधारा की गहरी छाप स्पष्ट है। यहां असल सवाल समुदाय विशेष को दिए गए आरक्षण की नहीं है। अंबेडकर द्वारा तैयार किए आरक्षण को राजनीतिक दलों ने अपने तरीके से परिभाषित करने का तरीका ईजाद कर लिया है, जो अपने फौरी लाभ के लोभ में आरक्षण की घुट्टी पिला कर अपना मतलब निकालने में जुटी नजर आती हैं।

बार-बार अदालत के हस्तक्षेप के बावजूद स्वयं केंद्र सरकार ने इसका कोई ठोस हल निकालने की जहमत नहीं की है। हकीकत में संविधान की रक्षा करने के लिहाज से, इतिहास तो किसी कीमत पर बदला नहीं जा सकता पर हमारी कोशिश होनी चाहिए कि समाज में सौहार्द बरकरार रहे।

शांति भंग करने व देश का माहैल बिगाड़ने वालों पर सख्ती होनी चाहिए। संविधान की आड़ लेकर एकतरफा बात करना या इसका समर्थन करना कहीं से भी उचित नहीं कहा जा सकता।



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