व्यक्तित्व

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ज्यादातर लोगों ने अपने व्यक्तित्व का बड़ा हिस्सा अनजाने या कहें अपनी अचेतनता में बनाया हुआ है.

जब आप पंद्रह या सोलह साल के थे, तो अक्सर ऐसा होता था कि किसी फिल्म को देखने के बाद आप अनजाने ही उसके हीरो की तरह चलना या उठना-बैठना शुरू कर देते थे. जब मैं स्कूल में था, तो मेरे साथ एक लड़का पढ़ता था. स्कैच बनाने में उसका बड़ा अच्छा हाथ था. हमारे भूगोल के शिक्षक बड़े गुस्सैल थे. एक बार उस लड़के ने ब्लैकबोर्ड पर उनका एक कार्टून बना दिया.

इसे काफी विकृत किया गया था लेकिन हर कोई पहचान सकता था कि वह किसका है. उस दिन वह क्लास में आए तो गुस्से में थे, इस कार्टून ने उनका पारा और चढ़ा दिया. उन्होंने पूछा ‘किसकी है यह करतूत?’ जैसा कि होना था हर बच्चा भूगोल की किताब में ऐसे व्यस्त हो गया जैसे कि सबको भूगोल पढ़ना पसंद हो! लग रहा था कि किसी को इसके बारे में कुछ पता ही न हो. शिक्षक ने फिर पूछा.

अंत में एक बच्चा खड़े होकर बोला ‘हमें वाकई नहीं पता, लेकिन हां जिसने भी किया है, उसके माता-पिता इसके लिए जिम्मेदार हैं.’ इस शरारत के लिए जिसे आप ‘मैं’ कहते हैं, आपके माता-पिता जिम्मेदार नहीं हैं. आप खुद हैं. जीवन के साथ आपको जबर्दस्त संभावनाएं हासिल हुई थीं, लेकिन उन्हें इतनी छोटी-सी संभावना में विकृत करके आपने बड़ा अपराध किया है.

आपका व्यक्तित्व जो एक कार्टून है, वह आपकी मदद के बिना एक दिन के लिए भी नहीं टिक सकता. आपको हर वक्त इसे सहारा देना होगा. ध्यान का मतलब भी एक तरह से यही है, आप अपने व्यक्तित्व से इस सहारे को छीन रहे हैं. अचानक यह बिखर जाता है, और फिर केवल उपस्थिति रह जाती है, व्यक्ति गायब हो जाता है.

कभी लोगों से एक अलग तरीके से मिलकर देखिए. मसलन, जिस व्यक्ति से आप मिल रहे हैं, उसके हिसाब से उस वक्त जैसा व्यक्तित्व जरूरी हो, वैसा ओढ़ लीजिए. ऐसा करके रोज एक नया कार्टून बनाने का मौका मिलेगा जो अपने आप में मजेदार होगा. लेकिन एक बार किसी खास विकृति (व्यक्तित्व) में अगर उलझ गए तो बड़ी समस्या हो जाएगी. अगर आप रोजाना एक नई विकृति (व्यक्तित्व) पैदा कर लेते हैं, तो इसे कला कहा जाएगा. अगर एक ही विकृति में उलझे रह गए तो पंगु बन जाएंगे. यही बड़ा अंतर है.