द्वितीय विश्व युद्ध की ‘चिंडिट सेना’ की याद ताजा की सेना ने

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द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान तत्कालीन बर्मा में जापानी सेना के खिलाफ खड़ी की गयी भारतीय सेना की गुरिल्ला टुकड़ियों (चिंडिट) के अदम्य साहस और संकल्प की याद ताजा करने के लिए सेना के 100 रणबांकुरे जंगल के रास्ते 20 दिन के ‘चिंडित अभियान’ पर निकले हैं. 

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजों ने 1943 में बर्मा में जापानी सेना को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए भारतीय सेना की गोरखा टुकडियों को मिलाकर एक विशेष गुरिल्ला सेना तैयार की थी जिसे चिंडिट नाम दिया गया था. 

भारतीय सेना की गुरिल्ला टुकड़ियों (चिंडिट) के अदम्य साहस और संकल्प की याद ताजा करने के लिए सेना के 100 रणबांकुरे जंगल के रास्ते कमोबेश उसी तरह की परिस्थितियों का सामना करते हुए 20 दिन के ‘चिंडित अभियान’ पर निकले हैं. 

मध्य भारत के दुर्गम जंगलों, पहाड़ों और नदियों वाले क्षेत्र में गहन प्रशिक्षण लेने वाली इस चिंडिट सेना ने अपने पराक्रम और अभियानों से जापानी सेना का मनोबल तोड़ा था. इस गुरिल्ला सेना के अभियानों ने जापानी सेना की हार में निर्णायक भूमिका निभायी थी. 


         
चिंडिट सेना के पराक्रम की याद ताजा करने के लिए कैप्टन सचित शर्मा के नेतृत्व में सेना के 100 जवान मध्य भारत के दुर्गम जंगलों के रास्ते 20 दिन के विशेष अभियान पर निकले हैं. ये रणबांकुरे 400 किलोमीटर लंबे इस अभियान में बिना किसी भी तरह की सुख सुविधाओं के केवल जंगल में उपलब्ध खान-पान की चीजों के सहारे ही गुजारा करेंगे और चिंडिट के वास्तविक अनुभव को महसूस करेंगे. चार चरणों के इस अभियान में 25-25 सैनिकों की चार टुकड़ी होंगी जो देवगढ, शादपुर, दमोह और नोरादेही के दुर्गम इलाकों से गुजरेंगे.