बिना चेकअप हुआ बीमा भी वैध

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि मेडिकल जांच के बिना प्रीमियम राशि वसूलने पर बीमा पॉलिसी जायज है. यदि मेडिकल जांच अनिवार्य है तो बीमा कंपनी को पहले डाक्टरी मुआयना करने के बाद ही प्रीमियम वसूलना चाहिए. 

प्रीमियम वसूलने के बाद और बीमाधारक की मौत होने पर उसे मुआवजे की राशि अदा करने के बजाए मेडिकल जांच नहीं कराने का बहाना नहीं चलेगा. मृतक की परिजन सम्पूर्ण बीमा राशि प्राप्त करने के हकदार हैं.
जस्टिस एनवी रमण और अब्दुल नजीर की बेंच ने हैदराबाद के डी श्रीनिवास की अपील पर यह अहम फैसला दिया. एसबीआई लाइफ इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड ने यह कहकर बीमे की धनराशि देने से मना कर दिया था कि श्रीनिवास के बेटे डी वेणुगोपाल ने मेडिकल जांच नहीं कराई थी. इसलिए उसकी मौत होने पर बीमे की रकम का भुगतान नहीं किया जा सकता. डी श्रीनिवास, उनकी पत्नी सुगुना और बेटे वेणुगोपाल ने मकान बनाने के लिए बैंक अफ हैदराबाद से 30 लाख रुपए का संयुक्त रूप से हाउसिंग लोन लिया था. कर्ज लेने के लगभग दो माह बाद ही वेणुगोपाल की हार्ट अटैक से मौत हो गई थी. हाउसिंग लोन के साथ ग्रुप इंश्योरेंस किया गया था और इसके लिए बाकायदा प्रीमियम वसूला गया था.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बीमे की शर्त में साफतौर पर कहा गया है कि साढ़े सात लाख रुपए से अधिक का बीमा होने पर मेडिकल जांच जरूरी है. लेकिन मेडिकल जांच कराने का दायित्व बीमा कंपनी का है, न कि उपभोक्ता का. स्वास्थ्य की जांच-पड़ताल के बिना बीमे का प्रीमियम वसूल कर लिया गया है तो यह माना जाएगा कि बीमा कंपनी ने चिकित्सकीय परीक्षण से छूट प्रदान कर दी है. बीमाधारक की मौत के ढाई साल बाद प्रीमियम की राशि रिफंड करना किसी भी सूरत में जायज नहीं है. एसबीआई लाइफ को बीमे की समस्त राशि मृतक के परिजन को देनी होगी या कर्ज की रकम में उसे समाहित करना होगा. 
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि परिवार के तीनों सदस्यों ने संयुक्त रूप से सितम्बर 2008 में हाउसिंग लोन लिया था. 29 सितम्बर, 2008 को कर्ज खाते में से 78 हजार, 150 रुपए एसबीआई लाइफ को बीमे की किश्त के रूप में अदा किए गए. बीमा पलिसी जारी करने से पहले उससे भला-चंगा होने की स्वास्थ्य घोषणा पत्र भी भरवा लिया गया था जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया था कि वह किसी भी गंभीर बीमारी से पीड़ित नहीं है.