2019 चुनाव : क्षेत्रीय दलों के पास है चाबी

अनिल सिन्हा,

देश  में क्षेत्रीय पार्टियां फिर से जड़ जमाने लगी हैं। भाजपा के राष्ट्रीय स्तर पर उभार के बाद लगने लगा था कि अब क्षेत्रीय पार्टियों का जमाना लद गया है। कर्नाटक चुनाव के नतीजों ने साफ कर दिया कि ऐसा सोचना गलत होगा कि इन पार्टियों की लोकप्रियता कम हुई है। महाराष्ट्र के भंडारा की लोक सभा सीट एनसीपी ने जीत ली और पालघर की सीट पर शिव सेना ने भाजपा के कड़ी टक्कर दी। 2019 के चुनावों में सत्ता की चाबी क्षेत्रीय दलों के पास होगी।
अगर हम ध्यान से देखें तो कई राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियां भाजपा को टक्कर दे रही हैं। कुछ राज्यों में तो उनकी इतनी ताकत है कि वे राष्ट्रीय पार्टियों को गिनती में भी नहीं लेती हैं। इसमें ममता बनर्जी और नवीन पटनायक की पार्टी के नाम तो लिये ही जाएंगे। लालू प्रसाद, चंद्रा बाबू  और नीतीश कुमार के दलों के नाम भी आएंगे। बिहार में रामविलास पासवान और उपेंद्र कुशवाहा की पार्टियां भी भाजपा को आंख दिख रही हैं। उत्तर प्रदेश में अखिलेश व मायावती की पार्टियां ही नहीं, अजीत सिंह की पार्टी भी करतब दिखाने के मूड में है। तमिलनाडु में तो राष्ट्रिय पार्टियों का टिकट काफी पहले कट चुका है।
चुनावों के नजदीक आने के बाद आरएसएस और भाजपा की रणनीति में आए परिवर्तनों पर गौर करने की जरूरत है। दोनों ने अपना फोकस बदल लिया है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह देश तो नामी लोगों से मिलने के लिए देश के दौरे पर निकल पड़े हैं। इनमें क्षेत्रीय दलों के नेताओे के नाम भी शामिल हैं। शिव सेना की राजनीतिक बदसलूकी को नजरअंदाज कर वह उद्धव ठाकरे से मिल आए। शायद इसी रणनीति के तहत आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने भी कह डाला कि दूसरों की विविधता को स्वीकार करना चाहिए। उनकी यह घोषणा उन संगठनों से सहयोग लेने के लिए है, जो विविधता में यकीन रखते हैं। यह न तो अपनी पुरानी नीति को त्यागने के लिए है और न ही विविधता के दर्शन को अपनानें के लिए है। संघ ने समय-समय पर ऐसे कदम उठाए हैं जब उसे अपने लिए संभावनाएं दिखी हैं। कई लोगों को लग सकता है कि भाजपा अपनी लोकप्रियता के चरम पर पहुंच कर ऐसा क्यों कर रही है? पिछले दिनों हुए चुनावों और देश की आर्थिक हालत पर भी गौर करने पर सवाल का जवाब आसानी से मिल सकता है। लोक सभा के ज्यादातर उपचुनाव भाजपा ने हारे हैं। राज्यों के कई चुनावों में उसे  तिकड़म की जीत ही हासिल हुई है। उसने  भ्रष्ट लोगों को भी बड़े पैमाने पर पार्टी में आयात किया है। इसके बावजूद वोटों के प्रतिशत में वह 2014 की लोकप्रियता कायम नहीं रख पाई और जहां भी विपक्षी एकता हो गई वहां उसे मुंह की खानी पड़ी है। इस एकता को तोड़ने के लिए यह जरूरी हो गया है कि संघ परिवार अपना चेहरा सौम्य करे ताकि सहयोगी दल उसके साथ रह सकें। लोगों को अपने साथ बांधे रखने का सांप्रदायिक फार्मूला भी चल नहीं पा रहा है। इसे कम से कम उत्तर प्रदेश के उपचुनावों ने पूरी तरह साबित कर दिया है। भाजपा और संघ को यह लगने लगा है कि नरेन्द्र मोदी अकेले दम पर चुनाव की नाव पार न हीं लगा सकते हैं। ऐसे में मोदी और भाजपा के सामने क्षेत्रीय पार्टियों के साथ जाने के अलावा कोई उपाय नहीं है।
कांग्रेस और राहुल गांधी ने क्षेत्रीय ताकतों के पहचानने में ज्यादा देरी नहीं की। गुजरात में राहुल ने जिग्नेश मेवानी और हार्दिक पटेल जैसी स्थानीय शक्तियों को साथ लेकर ही भाजपा को कड़ी टक्कर दी। चुनाव के बाद कर्नाटक में उन्होंने जेडीएस से हाथ में मिलाने में भी देरी नहीं की। आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू और तेलंगाना में टीआरएस जैसी पार्टियां हैं, जिन्हें अब कांग्रेस से नहीं भाजपा से डर लग रहा है। उड़ीसा के नवीन पटनायक फिलहाल मिले-जुले संकेत दे ही रहे हैं। लेकिन उनका भाजपा के साथ आना संभव नहीं है। वह भाजपा और कांग्रेस से समान दूरी बनाए रखना चाहते हैं। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के लिए भाजपा एक सहज पसंद हो सकती थी। फिलहाल, ममता के लिए भाजपा नंबर एक दुश्मन है। उसके लिए यह सहूलियत की बात भी है क्योंकि इससे मुसलमानों को समर्थन उसके लिए पक्का हो जाता है।