‘शरीफ’ कबूलनामा

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पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने मुंबई हमले के बारे में जो कुछ कहा है, उसमें प्रथमदृष्टया भारत के लिए नया कुछ नहीं है। हम पहले से सबूतों के साथ कहते आ रहे हैं कि पाकिस्तान से आए लश्कर-ए-तैयबा के आतंकवादियों ने उस घटना को अंजाम दिया था। किंतु पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री और किसी पद पर न रहते हुए भी सत्तारु ढ़ पार्टी के व्यावहारिक प्रमुख का बयान मायने रखता है।

उन्होंने अपने बयान में यह साफ संकेत दिया है कि सब कुछ जानते हुए भी पाकिस्तान में उस हमले के गुनहगारों को सजा देना संभव नहीं हुआ। वे कहते हैं कि हमारे यहां आतंकवादी संगठन सक्रिय हैं। यह ठीक है कि हमारा उनसे संबंध नहीं लेकिन क्या हम उन्हें इसकी छूट दे सकते हैं कि वो सीमा पार करके डेढ़ सौ लोगों को मार दें? ध्यान रखिए, 26 नवम्बर 2008 को मुंबई पर हुए आतंकवादी हमलों में 166 लोग मारे गए थे। उन्होंने यह प्रश्न उठाकर कि हम क्यों नहीं उस मामले की सुनवाई पूरी कर सके; वहां की न्यायपालिका, जांच एजेंसियां एवं सेना तीनों को कठघरे में खड़ा कर दिया है।

उनके बयान से यह भी साफ है कि वहां जनता द्वारा निर्वाचित सरकार भी चाहकर बहुत कुछ नहीं कर सकती। शरीफ अगर कह रहे हैं कि आप एक ऐसे देश को नहीं चला सकते, जहां दो या तीन समानांतर सरकारें तो इसका अर्थ साफ है। हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि न्यायालय ने उन्हें प्रधानमंत्री और सांसद ही नहीं अपनी पार्टी के अध्यक्ष पद के लिए भी अयोग्य करार दिया है और इसके पीछे सेना की भूमिका है, इसलिए वे खीझ में यह बयान दे रहे हैं। हो सकता है यह सच हो। उनके खिलाफ विदेशों में संपत्ति जमा करने के आरोपों की भी जांच चल रही है।

सेना इस समय उनके साथ उनकी पार्टी को भी दरकिनार करने में लगी है और परोक्ष रूप से वह न्यायालय का सहारा ले रही है। किंतु उनकी बात से यह जाहिर होता है कि वे मुंबई हमले के गुनाहगारों को शायद सजा दिलाना चाहते थे लेकिन उनको ऐसा करने नहीं दिया गया। वो कहते हैं कि हमें रूस और चीन के राष्ट्रपतियों ने इसके लिए टोका।

इसका अर्थ है कि भारत की कूटनीति का असर इस मामले में हुआ और विदेश की प्रमुख सरकारों ने पाकिस्तान को गुनहगारों के खिलाफ न्यायिक प्रक्रिया पूरी करने के लिए कहा। चीन का कुछ कहना पाकिस्तान के लिए मायने रखता है। इसलिए यह संभव है कि नवाज शरीफ ने हमले के गुनाहगारों को सजा दिलाने की कोशिश की हो।