‘मी टू’ अभियान : ..अंजामे गुलिस्ता क्या होगा?

अरुण माहेश्वरी,

‘मी टू’ अभियान ने क्रमश: भारत में अपने विस्तार के संकेत देने शुरू कर दिए हैं। आज के ‘टेलीग्राफ’ में एक पत्रकार प्रिया रमानी के ट्वीट को अखबार की प्रमुख सुर्खियों में स्थान दिया गया है, जिसमें उन्होंने वर्तमान विदेश राज्यमंत्री एमजे अकबर पर सीधा आरोप लगाया है कि किस प्रकार 1994 में  जब अकबर ‘टेलीग्राफ’ पत्रिका के संपादक थे, मुंबई में एक होटल के कमरे में नौकरी के लिए साक्षात्कार लेते वक्त उन पर टूट पड़े थे। अंग्रेजी की लोकप्रिय ‘वोग’ पत्रिका में उन्होंने अपने इस पूरे अनुभव का बयान अकबर को प्रथम पुरुष ‘डियर बॉस’ से संबोधित करते हुए किया है। इसमें वे लिखती हैं कि ‘उस रात तो मैं बच गई। आपने मुझे काम पर लगाया, कई महीनों तक मैंने आपके यहां काम किया लेकिन तभी अपने मन में मैंने यह शपथ ले ली थी कि आपके साथ कभी कमरे में अकेले नहीं रहूंगी।’
8 अक्टूबर को ही प्रसिद्ध पत्रकार स्वाति चतुर्वेदी ने भी एक ट्वीट करके काफी विस्तार के साथ ‘फर्स्ट पोस्ट’ में प्रकाशित इसी कहानी को बयां किया है, जिसमें एक ख्यात अखबार के ‘संस्थापक संपादक’ और मुंबई के होटल के कमरे का ही जिक्र है। उस संपादक का बिना नाम दिए इतना जरूर कहा गया है कि वह अभी सरकार में एक ऊंचे पद पर है। स्वाति ने भी यही बताया है कि जब पत्रकारिता के क्षेत्र में कोई व्यक्ति कदम रखता है, और किसी अखबार की ख्याति अगर शिखर पर हो तो उसमें काम का मौका पाना किसी भी नौजवान पत्रकार के लिए एक मूल्यवान अवसर होता है।
उस समय इन संपादक ने मौके का लाभ उठा कर इस नौजवान पत्रकार के शरीर पर टूट पड़ने की कोशिश की। स्वाति ने अपनी कहानी में पत्रकार का नाम नहीं बताया है, लेकिन आज के टेलीग्राफ में वह नाम खुल कर सामने आ गया है। जाहिर है कि बॉलीवुड में तनुश्री दत्ता ने नाना पाटेकर के संदर्भ अपने अनुभव का जिक्र करके भारत में इस जिस नये ‘मी टू’ अभियान की शिखा जलाई है, उसकी रोशनी अब क्रमश: हमारे समाज के दूसरे अंधेरे कोनों को भी प्रकाश में लाने लगी है। ‘इकोनोमिस्ट’ पत्रिका ने (29 सितम्बर-5 अक्टूबर, 2018) अंक में ‘मी टू’ को अपनी कवर स्टोरी बनाया है, और इससे समाज के कथित संभ्रांतों और ताकतवरों द्वारा अपने पद और अधिकारों का प्रयोग करके औरतों का शोषण करने के निकृष्ट आचारणों के उद्घाटनों की गहनता और व्यापकता को देखते हुए यहां तक लिखा है कि ‘यह एक ऐसा आंदोलन है, जिसका प्रारंभ एक कथित बलात्कारी से हुआ है, लेकिन यह औरतों की समानता के लिए उन्हें मतदान के अधिकार के बाद एक सबसे शक्तिशाली बल साबित हो सकता है।’ यह आंदोलन साल भर पहले हॉलीवुड के एक बड़े फिल्म निर्माता हार्वे वींस्टन की कहानी से शुरू हुआ था, जब एक के बाद एक अभिनेत्रियों ने उसकी फिल्म में काम पाने के लिए उसे अपने शरीर को सौंपने के दर्दनाक अनुभवों को बयां करना शुरू किया।
वींस्टन एक आदतन बलात्कारी है, इसे कई सालों से हॉलीवुड के लोग जानते थे, लेकिन वह इतना ताकतवर था कि कोई बोलने का साहस नहीं कर पा रहा था। लेकिन इस एक साल में ही अब अमेरिका में इस बद्धमूल मान्यता को करारी चोटें लग रही हैं। अब वहां जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में ऐसे निरंकुश ताकतवरों की पशुता के किस्से सामने आने लगे हैं, बल्कि सिर्फ  अमेरिका में ही नहीं, सारी दुनिया में इसका सिलसिला चल पड़ा है। अभी अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट में ट्रंप ने एक जज की नियुक्ति की- ब्रेट कावनॉ की। उस पर भी यह अभियोग लगा कि कई दशक पहले जब वह छात्र था, उसने एक लड़की पर कामुक हमला किया था। यह अभियोग क्रिस्टीन ब्लासे फोर्ड नाम की महिला ने लगाया। इस उद्घाटन के बाद अमेरिका में तहलका मच गया। अमेरिकी सीनेट की न्याय कमेटी के सदस्यों ने कावनॉ से सीधे पूछताछ की और उसकी नियुक्ति पर आशंका के बादल मंडराने लगे थे। अभी दो दिन पहले जब उसकी नियुक्ति पर अंतिम मोहर लगी तो कई हलकों से उसे अमेरिका के इतिहास का एक काला दिन बताया गया। यह पूरा घटनाक्रम ‘मी टू’ आंदोलन के तेजी से विस्तार के संकेत दे रहा है। इसका अंतिम हश्र क्या होगा, कोई नहीं कह सकता। लेकिन अमेरिकी समाज के लिए इसे इसलिए सबसे बड़ी बात माना जा रहा है क्योंकि यह दर्शाता है कि उस समाज में सकारात्मक और प्रगतिशील परिवर्तन की भूख आज भी बाकायदा बची हुई है।
‘इकोनोमिस्ट’ ने इसका बुरा पक्ष यह भी बताया है कि कहीं यह ‘मी टू’ आंदोलन भी औरतों के शरीर से जुड़ी कहानियों पर चटखारे लेने वाली उपभोक्तावादी संस्कृति की खुराक न बन जाए! लेकिन अमेरिका के विभिन्न स्तरों पर इस बारे में औरतों की अपनी गवाहियों को जितनी गंभीरता से लिया जा रहा है, वह इस आंदोलन का सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण आयाम है। अन्यथा अब तक तो इस प्रकार के अभियोग लगाने वाली औरतों को ही समाज में बदचलन घोषित करके दुष्चरित्र पुरुषों के पापों को ढकने की परिपाटी चलती आ रही है। अदालतों के कठघरों में औरतों को जलील करना वकीलों के लिए आम बात रही है। भारत में भी तनुश्री दत्ता ने अनायास ही सभ्यता विमर्श से जुड़े इस महत्त्वपूर्ण आंदोलन की एक लौ जला दी है। इसीलिए हमने कल अपनी एक पोस्ट में लिखा था कि हमारे सामाजिक इतिहास में उन्हें इसके लिए हमेशा याद रखा जाएगा। अब क्रमश: इससे हमारे समाज में आगे और कैसा और कितना आलोड़न पैदा होगा, यह तो भविष्य ही बताएगा।
लेकिन आज ‘टेलीग्राफ’ पत्रिका के संस्थापक संपादक और वर्तमान केंद्रीय मंत्री का इस सिलसिले में जिस प्रकार नाम सामने आया है, उससे निश्चित तौर पर इस आंदोलन की गर्मी के बढ़ने के संकेत मिलते हैं। जैसा कि स्वाति की रिपोर्ट में ही बताया गया है कि प्रिया रमानी के पिता ने उन्हें पहले ही उस संपादक के चरित्र के बारे में सावधान कर दिया था। उसी प्रकार, इस क्षेत्र के अन्य लोग भी इस संपादक के चरित्र से अच्छी तरह वाकिफ होंगे। उनके और भी किस्से आ सकते हैं। यह राजनीति, पत्रकारिता, मीडिया, अध्यापन, न्यायपालिका और अन्य सभी बड़े संस्थानों में स्त्रियों के साथ बदसलूकी के सवालों को सामने लाने का सबब बनेगा; आगे इसके संदर्भ में कानूनी प्रावधानों के परिणाम भी निकलेंगे। और इससे पैदा होने वाला आलोड़न समग्र रूप से अंतत: हमारे समाज को अंदर से सबल और स्वस्थ बनाएगा।
देखिए-‘हर शाख पे उल्लू बैठा है, अंजामे गुलिस्ता क्या होगा!’