हिन्दू सकारात्मक परिवर्तन लाने वाला नजर आना चाहिए

भाषा, शिकागो

विश्व हिन्दू कांग्रेस ने कहा है कि विश्व में हिन्दुओं को सकारात्मक परिवर्तन लाने वाले के तौर पर ज्यादा नजर आना चाहिए और उसने दुनियाभर में विभिन्न देशों में हिन्दू अधिकारों पर बल देने के लिए एक स्थायी सचिवालय की स्थापना का प्रस्ताव भी रखा।
शिकागो में 1893 में विश्व धर्म संसद में स्वामी विवेकानंद के ऐतिहासिक भाषण की 125वीं वषर्गांठ पर यहां द्वितीय विश्व हिन्दू कांग्रेस का आयोजन किया गया। साठ से अधिक देशों से 2,500 से अधिक प्रतिनिधियों और 250 से अधिक वक्ताओं ने यहां इस तीन दिवसीय विश्व हिन्दू कांग्रेस में हिस्सा लिया। विश्व हिन्दू कांग्रेस के संयोजक अभय अस्थाना ने कहा कि इस कार्य को पूरा करने के लिए प्रख्यात व्यक्तियों की सेवा ली जाएगी और अमेरिका या ब्रिटेन में स्थायी सचिवालय स्थापित करने का सुझाव सामने आया। अस्थाना ने कहा, इस कांग्रेस में एक मुख्य सर्वसम्मत विचार सामने आया कि दुनिया में जहां-जहां हिन्दू हैं, यानी आज की तारीख में जिस किसी देश को वे अपना घर मानते हों, उन्हें सकारात्मक परिवर्तन लाने वाले के तौर पर ज्यादा नजर आना चाहिए। उन्होंने कहा, इस कांग्रेस के राजनीतिक सत्र में खासकर कैरीबयाई, फिजी और अफ्रीकी देशों में अपनी दृढ़ राजनीतिक आवाज को मजबूती से सामने रखने और युवा नेताओं के विकास के महत्व पर बल दिया गया। देशवार सभी राजनीतिक नेताओं का गतिशील डिजिटल डाटाबेस तैयार किया जाए। इस कांग्रेस में राजनीति के अलावा युवा, मीडिया, अर्थव्यवस्था, महिला, शिक्षा और हिन्दू संगठन जैसे विषयों पर अन्य पांच सत्र थे। कांग्रेस की ओर से जारी विज्ञप्ति में कहा गया कि दुनियाभर में हिन्दुओं पर होने वाले अत्याचार के विरुद्ध जागरुकता पैदा करने के लिए हिन्दू युवाओं को सोशल मीडिया कौशल का इस्तेमाल करना चाहिए, उन्हें हिन्दुओं के भेदभावपूर्ण निरुपण के विरुद्ध आवाज मुखर करनी चाहिए।
मोहनदास पाई, सोनल मानसिंह और नगास्वामी ने हिन्दू समाज पर तीसरे पूर्ण सत्र ‘हिन्दू समाज- अतीत का गौरव, वर्तन का दर्द और भविष्य के सपने’ विषय पर मंच साझा किया। प्रोफेसर सुभाष काक ने इस सत्र का संचालन किया। प्रोफेसर काक ने कहा कि हमारे पास गर्व करने के लिए कई चीजें हैं। आज की कई खोजों एवं वैज्ञानिक सिद्धांतों के बारे में पहले ही प्राचीन साहित्यिक कृतियों में उल्लेख किया जा चुका है। कंप्यूटर विज्ञान का असली जनक पाणिनी को माना जाना चाहिए जिन्होंने संस्कृत भाषा के लिए 4,000 नियम बनाए।