हिन्दी दिवस : भाषा: सामाजिक-आर्थिक आईना

रीतिका खेड़ा,

सामाजिक सुरक्षा पर शोध करना और इन मुद्दों को सरल रूप में जनता के सामने पेश करना, इन दोनों पर मेरा काम रहा है। शोध, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में, सरकार की कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन पर रहा है। शुरुआती सालों में जब अखबारों में लिखना शुरू किया तो अंग्रेजी में ही लिखा क्योंकि  बचपन से पढ़ाई अंग्रेजी माध्यम में ही हुई। उद्देश्य था कि ग्राामीण भारत और सरकारी योजनाओं की ऐसी झलक लोगों के सामने लाना जो शोध पर आधारित हो, जिसे हम अपने नजरिए से पेश करें।

हिन्दी में लिखते समय दिमाग में हमेशा सवाल रहता है  कि ‘दिमाग में’ लिखूं कि ‘मन में’; ‘स्नान’ या ‘नहाना’, ‘परेशानी’ कि ‘दिक्कत’ यानी, ‘शुद्ध’ हिन्दी का शब्द, कि ‘हिन्दुस्तानी’ लफ्ज, या फिर स्थायी भाषा में जैसे कि भात या चावल। बिहार और झारखंड की तरफ ‘दीजिए’ के लिए ‘बढ़ाइए’ इस्तेमाल होता है। भाषायी विडंबना है कि अंग्रेजी शब्दों का किस हद तक प्रयोग किया जाए। जुबान (या, भाषा) की शुद्धता पर जोर दूं कि पठनीयता पर। अंग्रेजी का हिन्दी में व्यवहार काफी बढ़ा है-क्या यह अच्छी बात है या बुरी? क्या इसे बढ़ावा दिया जाए या कि हिन्दी को पुराने रूप में बचाया जाए? वैसे ही, पुल्लिंग और स्त्री-लिंग के जो नियम हैं, वे अभी समस्त हिन्दी भाषी राज्यों में एक नहीं हैं। बिहार और झारखंड में जो पुल्लिंग है (‘नींद आ रहा है’), वह राजस्थान और मध्य प्रदेश में स्त्री-लिंग है (‘नींद आ रही है’)।  एक ऐसी अर्थशास्त्री होने के नाते जो हिन्दी में लिख और बोल पाती है, मेरे कई दिलचस्प अनुभव रहे हैं। मुख्यधारा की मीडिया में शायद इस तरह के लोग कम मिलते हैं। इस वजह से किसी भी आर्थिक नीति पर बुलाए जाने की दिक्कत अखबार से ज्यादा टेलीविजन में आती है। चैनल वालों का फोन आएगा कि हम कृषि, या रोजगार की चुनोतियां, या फिर रुपये की गिरावट पर चर्चा कर रहे हैं, आप जरूर आइए। हालांकि मैं ‘विशेषज्ञ हूं तो सामाजिक सुरक्षा के कार्यक्रमों की। किसी और का नाम सुझाकर माफी मांग लेती हूं, लेकिन इससे यह बात मुझे जरूर समझ आई कि केवल कोई टीवी पर बोल रहा है, मात्र इस ही वजह से उसकी बात नहीं मान लेनी चाहिए। कुछ समय तक, जो पॉपुलर लेख हैं, वो केवल अंग्रेजी में ही लिखे। फिर समझ आया कि केवल अंग्रेजी पाठकों तक अपना संदेश सीमित रखने से लक्ष्य अधूरा ही रहेगा। अंग्रेजी में लिखने का अनुभव हिन्दी में लिखने के अनुभव जैसा बिल्कुल नहीं। एक पहलू जिसमें स्पष्ट फर्क है, वो है पाठकों की प्रतिक्रिया। अंग्रेजी के पाठक, शायद ग्रामीण वास्तविकताओं से काफी दूर हैं, इसलिए इतना आसानी से हमारा पक्ष नहीं समझ पाते। उदाहरण के लिए जब जन वितरण प्रणाली में कई गरीब राज्यों में सुधार आने लगा (छत्तीसगढ़, ओडिशा, झारखंड और बिहार भी) और अपने शोध पर आधारित इस पर लिखा तो अंग्रेजी पाठकों की ओर से आरोप लगाया जाता कि हम ‘शहरी इंटेलेक्चुयल्स’ हैं,ंजिन्हें जमीनी स्थिति का आभास ही नहीं। दूसरी ओर, जब-जब हिन्दी में आधार पर लेख लिखे तब-तब मुझे कहां-कहां से फोन और ईमेल नहीं आए। कोई यह बताने लगा कि उसके साथ भी ऐसा हुआ, या फिर अपनी किसी समस्या का उपाय पूछने लगा। अंग्रेजी में आधार की आलोचना करने पर ऐसा कम ही हुआ है, और कभी कभी तो गाली-गलौच वाले ईमेल भी आ जाते हैं।
मुख्यधारा के मीडिया में सामाजिक सुरक्षा के मुद्दों के लिए जगह बनाना मुश्किल है। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। पहला, मुख्यधारा के मीडिया का कॉरपोरेटस्वरूप। जब मीडिया कॉरपोरेट-कंट्रोल्ड होगा, तब मुनाफा उनकी पहली प्राथमिकता होगी। मीडिया और मुनाफे का विवादास्पद  संबंध है। पाठक यदि शहरी हैं, तो शायद ग्रामीण मुद्दों में उनकी रुचि कम होगी; ऐसी स्थिति में यदि उनका अखबार फिर भी ग्रामीण मुद्दों को उठाएगा तो पाठक के दूसरे अखबार की तरफ जाने का डर पैदा होगा। दूसरा, मीडिया में ऊंचे वर्ग और ‘ऊंची’ जाति की पकड़ गहरी है।
कई सर्वे में पाया गया है कि संपादकीय पोजिशन में ब्राह्मणों और अन्य सवणों का राज है। उच्च वर्ग की, काफी हद तक, इन मुद्दों पर सहानुभूति कम होती है। व्यक्ति नहीं, वर्ग-जाति, उन्हें इन सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों और अन्य जुड़े सवालों पर शक्की मिजाज होने पर मजबूर करते हैं। हिन्दी और अंग्रेजी पाठकों की प्रतिक्रिया इतनी अलग होती है, जिससे यह अहसास होता है कि भारतीय समाज कितना बंटा हुआ है। जैसे दो अलग-अलग धाराएं, अगल-बगल में बह रही हैं, लेकिन आपस में कोई मेल नहीं। भाषा सामाजिक और आर्थिक असमानता का अहसास दिलाती है। भाषा से उपजीं चुनौतियां वास्तव में सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक चुनौतियां ही हैं।