हादसे की त्रासदी

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उत्तर प्रदेश के कुशीनगर दुदई में हुआ हादसा दिल दहलाने वाला है। सीवान से गोरखपुर जा रही पैसेंजर रेल (55075) और स्कूल वैन में हुई टक्कर में इतने बच्चों की जानें जाना सामान्य त्रासदी नहीं है। हर बच्चा भविष्य का संभावी राष्ट्रनिर्माता है। एक भी नौनिहाल की जान जाना राष्ट्र की अपूरणीय क्षति है।

हादसा मानव रहित क्रासिंग पर हुआ। रेलवे का कहना है कि वहां तैनात क्रॉसिंग मित्र ने स्कूल वैन को रोकने के लिए कहा, लेकिन उसका चालक ईअर फोन पर गाना सुन रहा था, इसलिए वैन को आगे बढ़ा दिया। अगर सचमुच ऐसा है तो यह देश भर के स्कूलों के सबक होना चाहिए कि वे चालकों को इसका सख्त आदेश दे कि गाड़ी चलाते समय ईअर फोन का उपयोग न करें। आखिर एक लापरवाही ने इतने नौनिहालों को हमसे छीन लिया।

हालांकि सच्चाई का पता तो जांच रिपोर्ट के बाद ही चलेगा। राज्य सरकार ने घटना के बाद जिस तरह की तत्परता दिखाई वह निश्चित रूप से सराहनीय है। स्वयं मुख्यमंत्री वहां पहुंचे और घायल बच्चों को गोरखपुर लाने के लिए 100 किमी ट्रैफिक खाली कराया गया, जिससे वे समय पर अस्पताल पहुंच सके। पूरा देश प्रार्थना कर रहा है कि घायल बच्चे स्वस्थ हो जाएं।

किंतु राज्य सरकार तथा रेल मंत्रालय ने जिस तरह मृतक बच्चों के परिवारों को केवल 2-2 लाख के मुआवजे की घोषणा की वह अस्वीकार्य है। आखिर बच्चों की मौत का 2 लाख मुआवजा दिए जाने का आधार क्या है? राज्य सरकार एवं रेल मंत्रालय इसका उत्तर दे। मुआवजा राशि में पर्याप्त वृद्धि की जानी चाहिए। दूसरे, इस भयावाह मानवरहित क्रॉसिंग के मुद्दे को फिर एक बार सामने ला दिया है।

रेलवे सुरक्षा की चर्चा में यह हमेशा से शामिल रहा है। यह प्रश्न तो उठता है कि मानवरहित क्रॉसिंग को खत्म करने पर लगातार चर्चा के बाद आज तक इनका अस्तित्व है क्यों? हालांकि अब इसे मानवरहित नहीं कहा जा सकता, क्योंकि ऐसे ज्यादातर रेलवे फाटक पर क्रॉसिंग मित्र नियुक्त कर दिए गए हैं। इससे हादसों में कमी भी आई है।

किंतु काकोदकर समिति ने मानव रहित क्रॉसिंग को खत्म कर उसकी जगह रेलवे पुल बनाने का सुझाव दिया था। हादसों की त्रासदी को रोकने के लिए यही सर्वश्रेष्ठ रास्ता है। अगर रेल विभाग ऐसा नहीं करता तो यही माना जाएगा कि आपको हादसों को रोकने की परवाह नहीं है। उम्मीद है केन्द्र सरकार इसकी ओर ध्यान देकर मानवरहित क्रॉसिंगों की जगह पुलों के निर्माण की ओर कदम बढ़ाएगा।