स्वागत योग्य कदम

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अशांत जम्मू-कश्मीर में स्थानीय निकायों के चुनाव का श्रीगणेश लोकतांत्रिक राजनीति के लिए स्वागत योग्य कदम है। चार चरणों में होने वाले नगरीय स्थानीय निकायों के पहले चरण के चुनाव में जनता का भाग लेना आतंकवादियों और अलगाववादियों के मुंह पर तमाचा है, जो शुरू से ही लोकतांत्रिक राजनीति के धुर विरोधी रहे हैं। इस बार भी उन्होंने धमकी दी थी, तो अलगाववादियों ने बंद का आह्वान। हालांकि कश्मीर घाटी में कई वाडरे में कोई प्रत्याशी खड़ा नहीं हुआ। वहां मतदान प्रतिशत भी कम रहा लेकिन जम्मू क्षेत्र में मतदाताओं में काफी उत्साह दिखा।

2005 में कराए गए नगरीय निकायों के चुनावों में तमाम व्यवधानों के बावजूद करीब 48 प्रतिशत मतदाताओं ने मतदान प्रक्रिया में भाग लिया था। दुर्भाग्यवश इस बार के चुनाव में प्रदेश की दो मुख्य पार्टियों-नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी ने भाग न लेने का फैसला किया है। उन्होंने अनुच्छेद 35ए की आड़ ली है, लेकिन राज्य के स्थानीय विकास के वाहक निकाय चुनावों का बहिष्कार करने से क्या उनका मनोरथ सिद्ध हो जाएगा? आतंकवादियों या अलगावादियों के भय से घाटी की जनता जरूर कुछ क्षेत्रों में मतदान करने से वंचित रही लेकिन इसका यह अर्थ नहीं लगाया जा सकता कि वह उनके साथ है।

निकाय चुनाव के बाद पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव होंगे, जो दो साल पहले ही कराए जाने चाहिए थे। उम्मीद की जा सकती है कि उसमें जनता उत्साहपूर्वक भाग लेगी। दरअसल, प्रदेश के जीवन में स्थानीय संस्थाएं विभिन्न रूपों में अपनी उपयोगिता साबित करने वाली हैं। एक तो ये स्थानीय स्तर पर लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करने का काम करती हैं।

दूसरे शासन प्रक्रिया में जनता की भागीदारी पाक-प्रायोजित आतंकवादियों के इरादे को विफल कर देगी क्योंकि उन्हें विकास चाहिए। सही है कि प्रदेश में स्थानीय संस्थाएं अपेक्षानुरूप काम नहीं कर पा रहीं। लेकिन स्थानीय स्तर पर विकास प्रकिया को गति देने में उनकी भूमिका नकारी नहीं जा सकती। मोदी सरकार इस बात को भलीभांति समझती है। आम जन की जिंदगी में इनकी अहमियत का ही नतीजा है कि पंचायत के सदस्य आतंकियों के निशाने पर होते हैं। बहरहाल, निकाय चुनाव से नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी के अलग रहने के कारण यह चुनाव भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबला बनकर रह गया है।