स्कूल की अमानवीयता

,

राजधानी दिल्ली के बल्लीमारान में एक पब्लिक स्कूल में फीस जमा न करने पर 59 बच्चियों को जिस तरह बंधक बनाकर रखा गया वो अमानवीयता तो है ही कानून का सीधा उल्लंघन भी है। इस खबर को जानने के बाद हर व्यक्ति के अंदर गुस्सा पैदा हुआ है। यह तो उन दादानुमा महाजनों जैसी करतूत हो गई, जो कर्ज लेने वालों को बंधक बनाकर उनके परिजनों से कहते हैं कि धन लाओ और इसे वापस ले जाओ।

उस स्कूल की प्राचार्या के दिमाग में इस प्रकार बच्चियों को उनकी वर्ग कक्षा से निकालकर तहखाने में बिठाए रखने का विचार आया कहां से? ठीक है उनके अभिभावकों ने समय पर शुल्क नहीं जमा किया या कुछ ने कई महीनों का शुल्क नहीं भरा होगा। तो वसूलने का यह तरीका नहीं हो सकता। यह खुलेआम अपराध है। अगर माता-पिता ने शुल्क नहीं भरा, उसमें उन बच्चियों का क्या दोष था?

हमें यह पता नहीं कि इसके पहले स्कूल की प्राचार्या ने शुल्क जमा करने के लिए माता-पिता से कितनी बार संपर्क किया। हम यह भी मान सकते हैं कि समय पर शुल्क न मिलने से शिक्षकों और कर्मचारियों का वेतन आदि खर्च चलाने में समस्याएं आतीं हैं। किंतु किसी भी परिस्थिति में बच्चियों के साथ इस तरह का अमानवीय बर्ताव अस्वीकार्य है। हालांकि शिक्षा अब जिस तरह एक व्यवसाय में तब्दील हो गया है, उसमें यह अस्वाभाविक नहीं है। इस प्रकार की ज्यादातर घटनाएं हमारे सामने आती ही नहीं। यहां भी एक दो बच्चियों का मामला होता तो शायद ही इस तरह सुर्खियां पाता।

चूंकि एक साथ इतनी बच्चियां थीं और प्राचार्या उनके अभिभावकों की कोई बात सुनने को तैयार नहीं हुई; इससे हंगामा हो गया और मामला पुलिस से लेकर मीडिया तक आ गया। अगर एक दो बच्चियां होतीं तो माता-पिता अनुनय-विनय करते, उनको बाहर निकाल दिया जाता जैसा इन सबको निकालने का भी आदेश प्राचार्या ने दिया था, वे कहीं  से बकाया शुल्क का बंदोबस्त करके आते तभी शायद अपनी बच्ची को ले जाते।

तत्काल मामला दर्ज हो गया लेकिन निदान यह नहीं है। हमारा मानना है कि सरकारी शिक्षा तंत्र को ऐसा बनाया जाए ताकि नर्सरी से लेकर प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालयों फिर से आकर्षण का केंद्र बनें। पब्लिक स्कूलों की निर्ममता से बचाने का यही एकमात्र रास्ता है।