सुलह कर लें

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दिल्ली पुलिस दिल्ली प्रदेश के मुख्य सचिव अंशु प्रकाश से कथित मार पिटाई मामले में जिस तरह आगे बढ़ रही थी उससे साफ लग रहा था कि वह मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल और उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को भी आरोपित करेगी। मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी के न्यायालय में भारी-भरकम 1300 पृष्ठों का आरोप पत्र दायर किया गया है उसमें 13 विधायकों के साथ इन दोनों के भी नाम हैं। पुलिस ने केजरीवाल से 18 मई को तीन घंटे पूछताछ की थी। उसके बाद उन्होंने मनीष सिसोदिया से भी पूछताछ की थी।

सुनवाई आगामी 25 अगस्त को है और उस दिन दंडाधिकारी इस अरोप पत्र का संज्ञान लेने पर विचार करेंगे। देखना है आगे क्या होता है! जिस तरह यह मामला आरंभ हुआ है और अभी तक जहां पहुंचा है, वह बेहद दुर्भाग्यूपर्ण है। मुख्यमंत्री के आवास पर 19 फरवरी की देर रात्रि बैठक में अंशु प्रकाश के साथ क्या हुआ, इसकी जानकारी या तो उनको है या वहां उपस्थित मंत्रियों, विधायकों को। अंशु प्रकाश ने 20 फरवरी को सिविल लाइन थाना में प्राथमिकी दर्ज कराई और मेडिकल जांच में उनके साथ मारपीट की पुष्टि हुई।

किंतु जानबूझकर उनको पीटने के लिए साजिश रचकर वहां बुलाया गया इसे प्रमाणित करना कठिन होगा। आरोप पत्र में गंभीर आरोप लगाए गए हैं। एक, केजरीवाल, सिसोदिया व अन्य विधायकों ने आपराधिक साजिश रचकर मुख्य सचिव को हत्या के इरादे से गंभीर चोट पहुंचाई। दो, कैद कर उनके साथ मारपीट की गई और अपमानित किया गया। तीन, सभी विधायकों ने शांतिभंग की। चार, उन लोगों ने मुख्य सचिव को अपनी लोकसेवक की जिम्मेवारी निभाने से रोका और कैद कर लिया। ये आरोप अगर सिद्ध हो जाएं तो इनको लंबी सजा हो सकती है।

पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की धारा 149 भी लगाया है। इसमें किसी गैर कानूनी जमावड़े का कोई सदस्य अपराध करता है तो उस अपराध का जिम्मेवार जमावड़े के सभी सदस्यों को माना जाएगा। जाहिर है, यह धारा इसलिए लगी है ताकि सभी को आरोपित बनाया जा सके। मुख्य सचिव के साथ यदि हल्की मारपीट भी हुई तो यह निंदनीय है। किंतु जो अपराध जितना बड़ा है, उसे उतना ही तक सीमित माना जाना चाहिए। मारपीट हुई भी तो उसके पीछे हत्या का इरादा था, इसको स्वीकार करना जरा कठिन है। अच्छा होता कि यह मामला मिल बैठकर सुलझा लिया जाता।