सीसीटीवी पर घमासान

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राजधानी दिल्ली में सीसीटीवी कैमरे लगवाने के मसले पर यहां के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उप राज्यपाल एक बार फिर से आमने-सामने हैं। मुख्यमंत्री केजरीवाल ने एक कार्यक्रम में सीसीटीवी को लेकर उप राज्यपाल द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट को मंच से फाड़ दिया। उनकी इस देहभाषा को संसदीय परंपराओं के अनुकूल नहीं कहा जा सकता। उनके इस अंदाज से राहुल गांधी की स्मृति ताजा हो गई, जब उन्होंने अपनी ही पार्टी के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की एक रिपोर्ट को सार्वजनिक तौर पर फाड़कर वाहवाही लूटनी चाही थी।

हालांकि पार्टी के भीतर और बाहर उनके इस कृत्य की जमकर आलोचना हुई थी। यह बात दीगर है कि यहां पर अरविंद केजरीवाल के सामने केंद्र सरकार के प्रशासनिक अधिकारी अनिल बैजल हैं। अभी पिछले ही दिनों दिल्ली सरकार बनाम उप राज्यपाल विवाद में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संवैधानिक पीठ ने सर्वसम्मति के निर्णय में कहा था कि लोकतंत्र में निरंकुशता और अराजकता के लिए कोई जगह नहीं है। इसका आशय बहुत स्पष्ट है। शीर्ष अदालत की यह टिप्पणी दोनों पक्षों पर लागू होती है।

इसी फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी सलाह दी थी कि दिल्ली सरकार और उप राज्यपाल मिल-जुलकर काम करें। शीर्ष अदालत की संवैधानिक पीठ ने अपने ऐतिहासिक फैसले में शासन सूत्र के सभी पहलुओं पर स्पष्ट आदेश दिया था, लेकिन अफसोस इस बात पर है कि दोनों पक्षों के बीच विवाद अब भी बना हुआ है। हाल ही में दिल्ली सरकार ने फिर से सुप्रीम कोर्ट में अपील की है कि हमारे मामलों की जल्द सुनवाई की जाए क्योंकि अफसरों की ट्रांसफर और पोस्टिंग में उप राज्यपाल अड़ंगा लगा रहे हैं और हम कोई काम करने में असमर्थ हैं।

यह अपील दिल्ली सरकार की तरफ से दायर की गई है। इसीलिए उसे बखूबी इस बात का पता है कि मामला सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है। इसलिए उसे फैसले आने तक इंतजार करना चाहिए था। जाहिर है कि केजरीवाल ने उप राज्यपाल की रिपोर्ट को सार्वजनिक मंच से फाड़कर संसदीय परंपराओं का उल्लंघन किया है। यह ठीक है कि लोकतांत्रिक मूल्य सर्वश्रेष्ठ हैं। केजरीवाल स्वतंत्र फैसले ले सकते हैं मगर उनका आचरण भी संसदीय परंपराओं के अनुकूल होना चाहिए।