सीरिया युद्ध : कहां खड़ा है भारत!

सतीश कुमार,

सीरिया पर अमेरिकी हमले से स्थिति बिगड़ती जा रही है। कई विशेषज्ञ इसे तृतीय विश्व युद्ध का आगाज मान रहे हैं। पिछले दिनों लंदन जासूसी कांड और जहर देने के मसले पर रूस और पश्चिमी देशों के बीच कूटनीतिक गहमा-गहमी अभी चल ही रही थी कि इसी दौरान सीरिया की चुनिंदा जगहों पर अमेरिका द्वारा भारी बमबारी कर दी गई। इस मुहिम को अंजाम देने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ब्रिटेन और फ्रांस का भी साथ लिया। रासायनिक हथियारों के भंड़ारों को नष्ट करने के लिए 105 मिसाइल दागी गई। हमले के बाद ट्रंप ने कहा कि तीन देशों ने बर्बरता और क्रूरता के खिलाफ कदम उठाया है। ट्वीट किया मिशन पूरा हुआ। सीरिया ने इस आक्रमण का कड़े शब्दों में विरोध किया है।

सीरिया ने कहा कि यह संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है। रूस, चीन और ईरान ने हमले की कठोर शब्दों में निंदा की। रूस ने तो धमकी भी दी है कि इसके परिणाम घातक होंगे। दूसरी ओर, सऊदी अरब और तुर्की समेत कई देशों के कार्रवाई का समर्थन किया है। प्रश्न उठता है कि क्या सीरिया का गृह युद्ध विश्व युद्ध का रूप ले सकता है? क्या विश्व के देशों के बीच दरारें बढ़ रही हैं, और शीत युद्ध की तरह विश्व दो फाड़ों में बंट रहा है। सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असाद को हटाने के लिए अमेरिका कई बार प्रयास कर चुका है। रूस और ईरान अशद के समर्थन में हैं। चीन अंतरराष्ट्रीय समीकरण को देखते हुए रूस के पक्ष में है। तुर्की और सऊदी अमेरिका के साथ खड़े हैं। सात वर्षो के युद्ध में पांच लाख से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। दरअसल, लड़ाई इस्लामिक स्टेट यानी आईएस को खत्म करने को लेकर शुरू की गई थी। रूस और अमेरिका इस मामले में एक ही मंच पर खड़े हैं।  

रूस के राष्ट्रपति पुतिन अडिग थे कि सीरिया में मजबूत नेतृत्व ही विद्रोही गिरोह को कब्जे में ला सकता है। दूसरी तरफ, अमेरिका और कुछ पश्चिमी देश अशद को हटाना ही प्राथमिकता समझते हैं। अमेरिका का मानना था कि जब तक अशद..को हटाया नहीं जाता तब तक समस्या का हल नहीं ढूंढ़ा जा सकता। बात वहीं बिगड़ने लगी। रूस ने 2015 में अशद को सैनिक सहायता भी मुहैया करवा दी। अब रूस और अमेरिका के बीच ठन गई है। कई खंडों में विखंडित है सीरिया। क्रुद की अलग छाप है। तुर्की, इराक और कई अन्य देशों का हस्तक्षेप है। सीरिया का उत्तर पश्चिमी इलाका सबसे ज्यादा पेचीदा है। विद्रोही गिरोहों का विस्तार इस क्षेत्र में ज्यादा है। अलोपो, इडलिब जैसे महवपूर्ण क्षेत्र विद्रोहियों के कब्जे में हैं। इन्हीं क्षेत्रों में अप्रैल, 2017 में अशद द्वारा रासायनिक हथियारों से हमला किया गया था, जिसमें मरने वालों की तदाद तकरीबन 150 से ज्यादा थी। ठीक एक वर्ष बाद पुन: सीरिया सरकार द्वारा उसी क्षेत्र में हमला किया गया है।

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की नीति ओबामा से अलग है। ट्रंप मध्य-पूर्व में अमेरिकी वर्चस्व, जो शीत युद्ध के दौरान था, को बहाल करना चाहते हैं। ओबामा बातचीत द्वारा रासायनिक हथियारों के प्रतिबद्ध सख्ती का पालन करने के हिमायती थे जबकि ट्रंप ने शक्ति प्रदर्शन की बात कही थी। दूसरी तरफ, रूस  के नेता पुतिन रूस की खोई हुई अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को पुर्नस्थापित करने की निरंतर कोशिश में लगे हुए हैं। शीत युद्ध से लेकर नाटो (सैनिक संगठन) के विस्तार तक हर कदम पर रूस को जलील और कमजोर करने की कोशिश अमेरिका और पश्चिमी देशों द्वारा की जाती रही है। पुतिन ने इसे चुनौती के रूप में लिया। पुतिन रूस के निरंतर सबसे शक्तिशाली नेता के रूप में उभरे। पिछले महीने पुन: राष्ट्रपति बनने के बाद यह बात पूरी दुनिया देख चुकी है। क्या रूस अमेरिका के साथ दो-दो हाथ करने के लिए सक्षम है? क्या वर्तमान रूस पूर्व सोवियत संघ की तरह सक्षम और शक्तिशाली है? रूस की श्रेणी में कितने देश खड़े हो सकते है? तमाम प्रश्नों का उत्तर जरूरी है।

अमेरिका की महत्वपूर्ण चुनौती रूस और ईरान को लेकर है। तुर्की की वजह से भी अमेरिका चिंतित है। कुर्द तुर्की की तरफ से सक्रिय हैं। अमेरिका जिनेवा सम्मेलन में तय फामरूले पर समस्या का हल चाहता है। अमेरिकी सेना सीरिया में तैनात है। सीरिया तुर्की सीमा पर विद्रोहियों से खाली करवाए गए क्षेत्र, जिसमें महवपूर्ण भूमिका अमेरिकी सेना की रही है, को अशद के हिस्से में नहीं जाने देना चाहता। अमेरिका उसी रणनीति, जिसे पश्चिमी देशों ने तैयार किया था, को अंजाम देने पर अडिग है, जिसके तहत अशद को हटाया जाना है। दूसरी तरफ रूस की वायुसेना सीरिया के उत्तर-पश्चिमी ठिकानों पर डटी है। पुतिन की रणनीति ईरान, सीरिया और तुर्की के साथ मिलकर विद्रोही गिरोह के क्षेत्रों को अपने में मिलाने की है। पिछले दो वर्षो में अशाद ने रूस की मदद से कई क्षेत्रों पर अधिकार जमा लिया है। तुर्की उस हर समीकरण के पक्ष में है, जहां से एक अलग कुर्द राष्ट्र की मांग को दबाया जा सके क्योंकि कुर्द राष्ट्र की मांग जोर पकड़ेगी तो सबसे अधिक नुकसान तुर्की को होगा। लाखों शरणार्थी सीरिया से भागकर तुर्की जा पहुंचे हैं। इसलिए तुर्की इस समस्या का हल अपने ढ़ंग से खोजने की कोशिश में है। शीत युद्ध के दौरान पूर्व सोवियत संघ और अमेरिका मुख्यत: अप्रत्यक्ष युद्ध लड़ रहे थे। अप्रत्यक्ष भिड़ंत में कई बार लगा और दिखा भी कि दुनिया तीसरे विश्व युद्ध के मुहाने पर है, लेकिन परिस्थितियों को संभाल लिया गया।

सीरिया युद्ध कई मायनों में शीत युद्ध से अलग है। इसमें भिडंत प्रत्यक्ष है। यह अलग बात है कि अमेरिका रूस को अत्यंत ही कमजोर समझता है। पूर्व सोवियत संघ वाला दमखम रूस के पास नहीं है लेकिन कहानी यहीं से शुरू होती है, खत्म नहीं। अमेरिका का मुख्य प्रतिद्वंद्वी चीन है। चीन प्रत्यक्ष रूप से सीरिया युद्ध में सम्मिलित नहीं है लेकिन अमेरिकी आक्रमण की निंदा उसने भी की है। रूस-अमेरिका भिड़ेंगे तो चीन रूस के पक्ष में होगा। सीरिया को लेकर बात बिगड़ती है तो विश्व युद्ध नकारा नहीं जा सकता।  भारत के सामने गंभीर कूटनीतिक चुनौती है। भारत संकट का हल राष्ट्र संघ के तत्वावधान में करने के पक्ष में है। भारत और अमेरिका के बीच संबंध काफी गहरे हैं। रूस भी भारत का मित्र है। 60 प्रतिशत से ज्यादा अस्त्र रूस ही भारत को निर्यात करता है। खैर, मानना जल्दबाजी होगा कि तीसरा विश्व युद्ध सीरिया से शुरू होगा।