सीरिया में घमासान

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अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस ने साथ मिलकर जिस तरह सीरिया पर 100 से ज्यादा मिसाइल हमले किए, उससे दुनिया का वातावरण कई आशंकाओं से ग्रस्त हो गया है। कई प्रश्न हर व्यक्ति के अंदर उठ रहे हैं। मसलन, यह हमला यहीं रुक जाएगा या फिर आगे ऐसा होगा? क्या इस हमले की प्रतिक्रिया भी होगी?

यद्यपि हमले के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि मिशन पूरा हुआ, लेकिन उनके पूरे भाषण में ऐसा कहीं नहीं था कि वे आगे हमले नहीं करेंगे। दूसरी ओर रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने इसे उकसाने वाली कार्रवाई बताया तो ईरान ने कहा कि इसके गंभीर परिणाम होंगे। पुतिन पहले से सीरिया के राष्ट्रपति बसर असल असद के साथ खड़े हैं, जबकि अमेरिका उनके खिलाफ है। हालांकि इस हमले का उद्देश्य सीरिया के तथाकथित रासायनिक हथियारों के तीन ठिकानों को नष्ट करना बताया गया।

राष्ट्रपति असद पर यह आरोप लगा था कि पिछले दिनों उन्होंने रासायनिक हमलों से अपने ही देश के करीब 100 नागरिकों को मौत की नींद सुला दिया। यह हमला घोषित तौर पर इसके ही खिलाफ था। प्रश्न है कि क्या इस तरह किसी देश पर हमला किया जाना चाहिए? भले लगता हो कि ऐसा नहीं होना चाहिए। यानी रासायनिक हथियारों की जांच करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था को पहले जांच के लिए भेजा जाना चहिए।

उसके बाद संयुक्त राष्ट्रसंघ में इस पर विचार हो एवं उसके बाद कार्रवाई का फैसला होना चाहिए। भारत ने यही विचार दिया है। किंतु सीरिया के संदर्भ में कार्रवाई पहले से हो रही है। वहां आतंकवादियों को खत्म करने के नाम पर अलग-अलग सोच के तहत रूस ने कार्रवाई की है, जिससे राष्ट्रपति असद की सहमति रही है। दूसरी ओर अमेरिका आदि ने भी कार्रवाई की है, जिससे उनकी सहमति नहीं रही है। बहरहाल, रूस इस हमले के खिलाफ सुरक्षा परिषद में प्रस्ताव लाने जा रहा है।

किंतु दुनिया नहीं चाहेगी कि किसी भी स्थिति में तनाव ज्यादा फैले। सीरिया इस समय दुनिया के लिए एक समस्या बना हुआ है किंतु उसका समाधान मिल बैठकर निकाला जाना चाहिए।

आतंकवाद ने सीरिया को पहले से ही तबाह कर दिया है, विद्रोहियों के साथ लड़ाई ने उसे और जर्जर किया है। आधा से ज्यादा आबादी शरणार्थी बनकर बाहर जा चुकी है। ऐसे में विश्व समुदाय की जिम्मेवारी ज्यादा बढ़ जाती है। वहां कोई भी कदम सोच-समझकर उठाया जाना चाहिए अन्यथा वह एक बड़े विनाश का कारण बन सकता है।