सीमित सोच का संकट

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कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के विचारों से असहमति रखते हुए भी इन दिनों अपने विदेश प्रवास में वह जिन सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों को उठा रहे हैं, उन्हें एक सिरे से खारिज भी नहीं किया जा सकता। जर्मनी और लंदन में उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, 1984 के सिख विरोधी दंगों और मोदी सरकार के कामकाज के तरीकों पर बहुत ही बेबाकी से अपने विचार व्यक्त किए हैं।

उन्होंने लंदन स्थित ‘इंटरनेशनल इंस्टीटय़ूट ऑफ स्ट्रेटैजिक स्टडीज’ में आयोजित एक कार्यक्रम में संघ की तुलना मुस्लिम ब्रदरहुड से की है, जिस पर भाजपा के भीतर तीखी प्रतिक्रिया हुई है। मुस्लिम ब्रदरहुड की स्थापना 1928 में मिस्त्र में हुई थी। पिछले कुछ वर्षो से कांग्रेस संघ के खिलाफ भगवा आतंकवाद जैसे कठोर और आक्रामक शब्दों का इस्तेमाल करती आ रही है।

इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए राहुल ने संघ के साथ मुस्लिम ब्रदरहुड की तुलना की है। दोनों संगठनों की प्रकृति में कुछ समानताएं भी हैं। मसलन, संघ की तरह मुस्लिम ब्रदरहुड भी अपने को सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन होने का दावा करता है।

संघ की स्थापना हिन्दू समाज के हितों की रक्षा के लिए हुई है, तो मुस्लिम ब्रदरहुड के नाम से ही स्पष्ट है कि इसका मकसद इस्लाम के नैतिक मूल्यों का प्रसार-प्रचार करना है। यह संगठन लोकतांत्रिक सिद्धांतों में निष्ठा व्यक्त करता है। लेकिन देश का शासन इस्लामी कानून यानी शरियत के आधार पर चलाने का समर्थन करता है।

हालांकि 2013 में इसको आतंकी संगठन घोषित कर दिया गया है। लेकिन संघ के साथ ऐसा नहीं हुआ है। शायद राहुल की मंशा है कि संघ के साथ विश्व समुदाय उसी तरह का व्यवहार करे जिस तरह से मुस्लिम ब्रदरहुड के साथ किया है। लेकिन राहुल के कथन के संदर्भ में बड़ा प्रश्न है कि 70 साल के कार्यकाल में कांग्रेस ने ऐसा क्या किया है, जिससे मुसलमानों में मुस्लिम ब्रदरहुड जैसे संगठन न उभरें और हिन्दुओं के बीच से कट्टर संघवाद न उभरे।

कट्टरता के विरुद्ध जो सबसे बड़ा हथियार भारत के पास था, वह संविधान स्वीकृत धर्मनिरपेक्षतावाद था। मगर कांग्रेस ने धर्मनिरपेक्षता की एकतरफा व्याख्या करके दोनों ही समुदायों में कट्टरपन को उभरने का अवसर मुहैया कराया है।

दुखद यह है कि राहुल के पास इस कट्टरपन से लड़ने का न कोई विचार है और न संगठन। काश राहुल विश्व मंच से इस संदर्भ में अपनी और कांग्रेस की कोई स्पष्ट रणनीति की घोषणा कर पाते।