सीमा पर फिर धोखा

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जम्मू-कश्मीर के सांबा जिले में अंतरराष्ट्रीय सीमा पर पाकिस्तानी रेंजरों की गोलीबारी में सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के एक सहायक कमांडेंट सहित चार जवानों के शहीद होने से पूरा देश स्तब्ध है, क्षुब्ध भी। इसलिए कि स्वयं पाकिस्तान ने आगे बढ़कर 2003 से लागू युद्धविराम को शब्दों और भावनाओं के अनुसार कायम रखने का वायदा किया था। 29 मई को दोनों देशों के सैन्य अभियान के महानिदेशकों यानी डीजीएमओ के स्तर पर बातचीत हुई थी। पाकिस्तान के डीजीएमओ ने साफ कहा था कि उनकी ओर से गोलीबारी नहीं होगी। उसके बाद 4 जून को सेक्टर कमांडर के स्तर पर बातचीत एवं बैठकें हुई थीं।

चूंकि पाकिस्तान ने इसकी पहल की थी, इसलिए लगा था कि वह अपने रवैये पर पुनर्विचार कर रहा है। किंतु इस तरह की कार्रवाई से साफ हो रहा है कि पाकिस्तान का रवैया बदलने वाला नहीं। या तो उसने धोखा दिया है या उसके यहां भारत को लेकर पहले की ही तरह कई मत हैं। इस समय पाकिस्तान में चुनाव के कारण एक पूर्व न्यायाधीश के हाथों देश की बागडोर है, इसलिए यह भी नहीं कह सकते कि इसके पीछे राजनीतिक प्रतिष्ठान की भूमिका है। किंतु हमारे लिए इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। हमारे लिए चार जवानों का जीवन अमूल्य था जो पाकिस्तान के धोखे के कारण खत्म हो गया।

बीएसएफ के स्थानीय अधिकारी के वक्तव्य से लगता है कि संघर्ष विराम के प्रति पाकिस्तान द्वारा प्रतिबद्धता जताने से वे निश्चिंत हो गए थे। रक्षा सामग्री लेकर जा रही टीम को पहले के अनुसार सुरक्षा कवच नहीं दिया गया था। इसी का फायदा पाकिस्तान ने उठाया। उसकी गोलीबारी व मोर्टार हमले में भारतीय जांबाज शहीद हो गए। हमें पूर्ण विश्वास है कि बीएसएफ इसका प्रतिकार करेगी जो पाकिस्तान के लिए हमारी क्षति से ज्यादा घातक होगा। किंतु इसका सबक यही है कि पाकिस्तान के किसी वायदे पर विश्वास  करना आत्मघाती होगा। हमें पहले की तरह ही चौकस रहना होगा।

मानकर चलना होगा कि पाकिस्तान की ओर से कभी भी गोलीबारी हो सकती है। वह ऐसा न कर सके इसके पूर्वोपाय एवं ऐसा करने के बाद के करारा प्रत्युत्तर के लिए हमें हर क्षण तैयार रहना होगा। यह इस क्षेत्र का दुर्भाग्य है कि हमारा पाला एक ऐसे देश से पड़ा है, जिसके लिए न किसी वचन की कीमत है, और न किसी लिखित समझौते की। बार-बार विश्वासघात झेलने के बावजूद यदि हम उसके कहे पर विश्वास कर लेते हैं, तो इसमें हमारी ही गलती है, उसकी नहीं।