सामयिक : करुणानिधि का जाना

श्री कृष्ण,

चौरानवे वर्षीय एम करुणानिधि के निधन से तमिलनाडु की राजनीति में एक बड़ा शून्य उभर आया है, और मद्रास उच्च न्यायालय ने जिस तरह उन्हें मरीना में उनके राजनीतिक गुरु सीएन अन्नादुरै की समाधि के निकट दफनाने की अनुमति दी उससे तो जैसे अन्नादुरै की विरासत भी उन्हें मिल गई। हालांकि अन्नादुरै की विरासत पर अन्नाद्रमुक दावा करती है। न्यायालय के फैसले से स्पष्ट हो गया है कि यह  न्यायसंगत था। भावनात्मक पहलुओं के मद्देनजर फैसले से अप्रिय और आशंकित स्थिति टल गई। यदि फैसला विपरीत होता तो गंभीर मुद्दा बन जाता।
करुणानिधि पांच बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री रहे। छह बार विधायक बने। और 1957 के बाद से वह कभी भी विधानसभा का चुनाव नहीं हारे।  उस समय भी नहीं जब अपने पार्टी सहयोगी रहे एमजी रामचंद्रन के अन्नाद्रमुक का गठन कर लेने के दौरान उन्हें तेरह वर्षो का राजनीतिक वनवास भोगना पड़ा। सच तो यह है कि करुणानिधि ने राष्ट्रीय और राज्य की राजनीति पर अमिट छाप छोड़ी है। जब विपक्ष ने एकजुट होकर 1977 में इंदिरा गांधी के खिलाफ मोर्चा बांधा था, तब करुणानिधि उस संघर्ष में अग्रणी रहे। बाद में 1989 में राजीव गांधी के खिलाफ वीपी सिंह के नेशनल फ्रंट का भी उन्होंने साथ दिया। उन्होंने क्षेत्रीय दलों अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने का रास्ता दिखाया। चौदह वर्ष की आयु में ही वे द्रविड़ आंदोलन में कूद पड़े थे। फिर आजीवन इसी आंदोलन के सिद्धांतों को उन्होंने अपनी राजनीति का आधार बनाए रखा। वह पेरियार ईवी रामास्वामी नीत द्रविड़ आंदोलन के सिपाही बने और इसी दौरान सीएन अन्नादुरै की नजर उन पर पड़ी। अन्नादुरै ने उनमें द्रविड़ आंदोलन के भावी नेता की झलक देखी। करुणानिधि भी आंदोलन के नेताओं की उम्मीदों पर खरे उतरे। हालांकि करुणानिधि ने राज्य के कमजोर तबकों तथा दलितों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया लेकिन राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने कल्याणकारी नीतियों की झड़ी लगा दी। उनके नेतृत्व में राज्य सरकार ने सुनिश्चित किया कि राज्य केवल औद्योगिक पावरहाउस ही बन कर न रह जाए, बल्कि राज्य के हर तबके का चहुंमुखी विकास हो। यही कारण रहा कि भारतीय राज्यों में सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी मानकों/संकेतकों के लिहाज से तमिलनाडु ऊंचे पायदान पर पहुंच गया। तमिलनाडु को देश का प्रमुख औद्योगिक राज्य बनाने का श्रेय उन्हें जाता है। चेन्नई को डेट्रायट कहा जाने लगा क्योंकि तमाम कार निर्माता कंपनियों को यहां अपनी निर्माण यूनिटें स्थापित करने का न्योता दिया गया।
कह सकते हैं कि करुणानिधि के नेतृत्व में द्रमुक नेताओं और उनके कुनबों की पार्टी बन गई। करुणानिधि ने अपने परिजनों को राजनीति में आगे लाने में कोई झिझक नहीं दिखाई। ऐसा करते में उन्हें पार्टी में किसी ने कोई चुनौती दी तो उसे तत्काल दरकिनार कर दिया। वह जन्मजात योद्धा थे। बालपन से ही यह गुण उनमें दिखाई देने लगा था। आगे रहकर विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लेने के लिए उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। मूल तमिल नाम कल्लाक्कुडी को बदल कर डालमियापुरम रखे जाने के विरोध में प्रदर्शन के दौरान उन्होंने रेल की पटरी पर लेटने से भी गुरेज नहीं किया। उन्हें तमिलनाडु का अपमान किसी सूरत बर्दाश्त नहीं था। अन्नादुरै के विसनीय होने के कारण उन्हें द्रमुक के प्रथम मंत्रिमंडल में स्थान मिला। लोक निर्माण एवं परिवहन मंत्री होने के नाते उन्होंने मद्रास के पहले फ्लाईओवर का निर्माण कराया जो आज जैमिनी फ्लाईओवर के नाम से जाना जाता है। बस परिवहन के राष्ट्रीयकरण की योजना को उन्होंने मूर्ताकार किया।
1950 का दशक तमिलनाडु में ब्राह्मणवादी वर्चस्व के विरोध के समय के रूप में याद किया जाता है। द्रमुक ब्राह्मणवादी वर्चस्व के खिलाफ अन्नादुरै के नेतृत्व में मोर्चा बांधा। इस संघर्ष में दो युवाओं करुणानिधि और एमजी रामचंद्रन (एमजीआर) ने उनके कंधे से कंधे से मिलाया। एमजीआर तमिल फिल्मों के लोकप्रिय सितारे थे, जबकि करुणानिधि फिल्मों के प्रसिद्ध पटकथा लेखक। करुणानिधि के विविधतापूर्ण व्यक्तित्व थे। उनका सार्वजनिक जीवन आठ दशकों का रहा। रोचक बात यह कि लेखक और राजनीतिक कार्यकर्ता, दोनों रूपों वे आगे बढ़े लेकिन अन्ना ने उन्हें पहले अपनी पढ़ाई पूरी करने की सलाह दी। लेकिन वे राजनीति में इस कदर रच-बस गए थे कि पीछे मुड़ना गंवारा नहीं किया। उनका लोगों के साथ जुड़ाव समय के साथ गहराता गया। अनेक लोगों तो उनकी सभाओं में उनके मुंह से भाइयों और बहनों सुनने ही उमड़ पड़ते थे। एमजीआर और जयललिता भी अपने संबोधनों की शुरुआत कुछ पारंपरिक शब्दों से करते थे, लेकिन उनके बोलने में करुणानिधि जैसा ओज नहीं आ पाता था।
करुणानिधि का राजनीतिक कौशल बेजोड़ था। अवसरों का भरपूर उपयोग करने में माहिर थे। राजनैतिक सौदेबाजी में भी बीस ही साबित होते थे। पार्टी में जिन लोगों का बढ़ता प्रभाव देखते तो उसे निष्प्रभावी करने की कला (वाइको के मामले में उन्होंने ऐसा किया) उन्हें अच्छे से आती थी। राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक गठजोड़ करने में भी उनका जवाब नहीं था। राष्ट्रीय नेताओं के मन में उनके लिए सम्मान था। चेन्नई में जब भी संकट दिखता राष्ट्रीय नेता तत्काल वहां पहुंचते थे। प्रांतीय स्वायत्तता के बड़े पैरोकारों में उनका शुमार था। जब-जब केंद्र ने राज्यों की सरकारों के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप करने का प्रयास किया करुणानिधि अन्य राज्यों को साथ लेकर विरोध में उतर आने में तनिक देर नहीं करते थे। लेकिन वह केंद्र में सत्ता में भागीदारी की जिम्मेदारी को भी समझते थे। साथ ही, भागीदारी से अपनी पार्टी को लाभान्वित कराने का हुनर भी उन्हें आता था।
लेकिन विडम्बना ही कही जाएगी कि अपने तमाम गुणों के बावजूद उनके परिवार में कलह उभरी। खासकर उनके दोनों बेटों-स्टालिन और अजागिरी-के बीच उभरे मतभेद मीडिया में खुलकर कर सामने आए। यह करुणानिधि ही थे जो आपस में तकरार करते अपने दोनों पुत्रों को एक साथ बनाए रख सके। करुणानिधि ने स्टालिन को पार्टी का कार्यवाहक अध्यक्ष बना दिया था, लेकिन अब उनके न रहने पर देखा जाना है कि पार्टी खासकर इन दोनों भाइयों में एकजुटता कायम रहती है, या नहीं। बहरहाल, इतना तय है कि स्टालिन ही करुणानिधि के रूप में माने जाएंगे। करुणानिधि की पुत्री कनिमोझी पर भी लोगों की नजरें रहेंगी। हालांकि उन्होंने अभी तक राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा नहीं दिखाई है, लेकिन आने वाले समय में तस्वीर साफ हो सकेगी। द्रमुक के लिए सुविधा की बात यह है कि जयललिता के बाद अन्नाद्रमुक कमजोर हुई है, वहां पार्टी स्तर पर असंतोष भी है।