सामयिक : इस्लाम का चीनीकरण

के. विक्रम राव,

इस्लामी पाकिस्तान की जानकारी में (बल्कि उसकी मूक स्वीकृति से) कम्युनिस्ट चीन अपने पश्चिमी प्रांत शिनजियांग में मुसलमानों का चीनीकरण कर रहा है। जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग की बैठक (11 अगस्त, 2018) में अपनी जांच रपट पेश करते हुए गेई मैकडूगल ने बताया कि बीस लाख मुसलमानों को माओवादी शिक्षण शिविरों में अनीरवादी बनाने के लिए कैद में रखा गया है। दस लाख सुन्नियों को जेल में नजरबंद कर दिया गया है। क्या अपराध है इन लोगों? इन लोगों का अपराध सिर्फ यही है कि ये अपनी जीवन पद्धति इस्लामी आचरण के मुताबिक संवारना चाहते हैं।
बर्लिन के प्रोफेसर हांस-क्रिश्चिन गुंथर ने चीन से लौट कर (26 अगस्त, 2018) को अपने मीडिया कॉलम में यह लिखा कि उइगर-भाषी  मुसलमानों के दमन से भारत का सीधा सरोकार होना चाहिए क्योंकि यह चीन की विदेश नीति का खास आधार बन चुका है। शिंजियांग के मुसलमानों के उत्पीड़न पर विभिन्न इस्लामी राष्ट्र, खासकर सऊदी अरब, की खामोशी यही दर्शाती है कि चीन से तिजारत का महत्त्व इस्लामी अकीदे से ऊपर है, अधिक है। सवा सौ करोड़ की हान नस्ल के चीनीजन के सामने दो प्रतिशत उइगर मुसलमान तो जीरे के बराबर भी नहीं हैं। लेकिन वे चीन के लिए सरदर्द से कम नहीं समझे जा रहे। उनके विरोधी तेवर और स्वर के कारण चीन के बहुसंख्यक उन्हें हर हाल में मिटा देना चाहते हैं। इसके लिए तीन तरीके अपनाए गए हैं। उइगर मुस्लिम युवतियों की शादी जबरन हान युवकों से कराई जा रही है। तुर्की भाषा की जगह चीनी मंडारिन को अनिवार्य भाषा कर दिया गया है, और उनके मजहबी दस्तूर और रिवायतों पर पाबंदी लगाई जा रही है।
जनसंख्या की दृष्टि से 1949 में झिनझियांग में 95 प्रतिशत उइगर मुसलमान और पांच प्रतिशत हान चीनी थे। आज की तारीख में दोनों पचास फीसद अर्थात् ठीक बराबर हो गए हैं। आखिर, कम्युनिस्ट चीन की केंद्रीय सरकार से इन उइगर मुसलमानों ने मांगा क्या था? बस वे अधिकार, जिनका भारत में हर मुसलमान दशकों से निर्बाध रूप से उपभोग कर रहा है, चाहते हैं। उइगर चाहते हैं : उन्हें जुम्मे की नमाज मस्जिदों में अदा करने दी जाए, वजू करने के लिए नल का पानी वहां पर मिले। हज यात्रियों की संख्या में की गई कटौती खत्म हो। पचास वर्ष से कम आयु वालों को हज पर जाने की इजाजत वापस दी जाए, अठारह वर्ष से कम उम्र वालों को मस्जिद प्रवेश की अनुमति दी जाए। उनकी मातृ भाषा तुर्की को सीखने पर लगी पाबंदी हटा ली जाए और उन पर मंडारिन भाषा कतई न लादी जाए। उइगर साहित्य को अरबी लिपि में ही रहने दिया जाए, मजहबी किताबों की बिक्री पर से पाबंदी उठा ली जाए, पाक कुरान पर सरकारी संस्करण न थोपा जाए, मदरसों की सील खोल दी जाएं, पुर्नशिक्षित करने के नाम पर बंदी शिविरों में अकीदतमंदों को जबरन नास्तिक न बनाया जाए। इसके साथ  ही, सरकारी दफ्तरों में नमाज पढ़ने के लिए अल्पावकाश का प्रावधान किया जाए। उनकी रिहायशी बस्तियों में घेंटी का गोश्त न बेचा जाए। उनके अपने रोजगार में बहुसंख्यक हान वर्ण के चीनीजन को वरीयता न दी जाए। उनकी ऐतिहासिक राजधानी कासगर को विश्व धरोहर करार दिया जाए।
उनकी ये मांग भी हैं कि ऐतिहासिक इमारतें ध्वस्त कर आवासीय कॉलोनी और शॉपिंग माल नहीं बनाए जाएं। उइगर मुसलमान उदार सूफी चिंतन से प्रभावित हैं। उनकी स्वाधीनता, विकास तथा समरसता वाली आकांक्षा को आतंकवाद कहना तथ्यों को विकृत करना होगा। उइगर मुसलमान उज्बेकियों के निकट हैं, जबकि तालिबानी लोग पश्तून हैं। दोनों परस्पर शत्रु हैं। एक भी उदाहरण ऐसा नहीं मिलता जब कोई उइगर मुसलमान किसी फिदायीन हमले का दोषी पाया गया हो। लेकिन चीन ने इन उइगर मुसलमानों पर आतंकवादी होने का ठप्पा लगा दिया है। लेकिन उसकी दुहरी नजर में जमात-उद-दावा, जो लश्कर का सियासी अंग है और भारत में कई वारदात को अंजाम दे चुका है, एक स्वयंसेवी संस्था है, जो मिल्लत की खिदमत करता है। इसलिए सवाल यह है कि हिन्दू-बहुल भारत में फल फूल रहे इस्लामी तंजीमों, अंजुमनों, संगतों तथा रफाकतों ने शिंगजियांग के सुन्नियों के प्रति एकजुटता और हमदर्दी कितनी और कब दिखाई? कश्मीरी गिलगिट से शिंगजियांग की राजधानी कासगर की दूरी सवा सौ किलोमीटर के करीब है। काराकोरम मार्ग से पुराने रेशम मार्ग होते हुए वहां पुहंचा जा सकता है।  
यह इलाका भारतीय सीमा के समीप है। किंतु यह प्रश्न इसलिए खटास भरा हो जाता है क्योंकि विश्व  में कहीं भी मुसलमानों पर हमला होता है, तो भारत के मुसलमान तुरंत सड़क पर उतर आते हैं। इस्रयल की अलअक्सा मस्जिद में तोड़फोड़ हो, डेनमार्क के अखबार में कोई काटरून बना दे, पेरिस के दैनिक अखबार में कोई व्यंग्यात्मक लेख छप जाए, चेचेन्या और कोसोवो के राष्ट्र्र विरोधियों पर पुलिसिया कार्रवाई हो या ऐसी ही कोई बात हो तो  भारतीय मुसलमान उससे अपना सीधा सरोकार जोड़ लेते हैं। हाल ही में हजारों मील दूर बर्मा के रोहिंग्यिा मुसलमान असम में घुस रहे थे, तो भारतीय सुरक्षा बलों से उनका टकराव हुआ। इस पर उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के मुसलमान हजरतगंज और वीटी स्टेशन तक बल्लम, बर्छी, छूरी, लाठी, जंजीर आदि लेकर उत्पात मचाने लगे, पुलिस असहाय थी।
मगर इन्हीं मुसलमानों ने आज तक शिंगजियांग के पीड़ित सधर्मियों के समर्थन में नई दिल्ली में पाकिस्तानी उच्चायोग और चीनी दूतावास के समक्ष प्रदर्शन नहीं किया। क्यों? देवबंदी, बरेलवी, जमाते इस्लामी, असदुद्दीन ओवैसी, नदवा कॉलेज (लखनऊ), दानीरों, अदीबों, अकीदतमंदों को इसका जवाब देना होगा। भारत सेक्युलर है, और यहां मजहबी सियासत करना गुनाह है। यदि इन लोगों को यह सेक्युलर कानून गंवारा नहीं है, तो ये दारुल इस्लाम को तलाश लें। दारुल हर्ब को छोड़ दें क्योंकि सत्तर साल हो गए, भारत मजहब के कारण पिछड़ता गया। नई पंथनिरपेक्ष पीढ़ी के बर्दाश्त के यह बाहर हो गया है। भारत अब दकियानूस नहीं रहेगा।