सही संदर्भ में लें

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देश की सर्वोच्च अदालत ने अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार अधिनियम के संबंध में दिये गये अपने फैसले पर फिलहाल रोक लगाने से इनकार करके न्याय की अवधारणा और सिद्धांत को ही पुख्ता किया है।

न्याय का तकाजा है कि सौ दोषी भले छूट जाएं, लेकिन एक भी निदरेष को सजा नहीं होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट एसएसी-एसटी एक्ट में संशोधन करके न्याय की इसी अवधारणा को आगे बढ़ाने का काम कर रहा है। यह कोई गोपन तथ्य नहीं है कि दहेज विरोधी कानून की तरह एससी-एसटी एक्ट का भी दुरुपयोग हो रहा है।

कहते हैं कि 15 हजार मामलों में 11 हजार मामले इसी तरह मनगढ़ंत पाये गए हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए सर्वोच्च अदालत ने केंद्र सरकार की ओर से दायर की गई पुनर्विचार याचिका की सुनवाई करते हुए साफ शब्दों में कहा कि वह इस कानून के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन निर्दोष को सजा नहीं मिलनी चाहिए।

दरअसल, अदालत की चिंता में वे निर्दोष लोग शामिल हैं, जो इस कानून का दुरुपयोग होने के कारण वर्षों से जेलों में बंद हैं। ऐसे भी उदाहरण हैं कि बहुत सारे तो न्याय पाने में गुजर भी गए। इसलिए दलित-आदिवासी समाज के साथ-साथ राजनीतिक दलों को भी अदालत के फैसले को सही परिप्रेक्ष्य में लेने की जरूरत है। यदि हम समरस समाज का निर्माण करना चाहते हैं तो हर तरह के अवरोधों को खत्म करना होगा।

आदर्श स्थिति तो यही होनी चाहिए कि न तो दलितों के साथ कोई भेदभाव हो या न इस मानसिकता के चलते उनके प्रति कोई अत्याचार हो और न दलितों की तरफ से ही उनसे असहमत समुदाय या सवर्ण समाज के प्रति कोई अत्याचार हो। दलित-आदिवासी समाज को यह भी समझने की जरूरत है कि उन्हें वास्तविक सामाजिक-राजनीतिक शक्ति सामाजिक संरचना से ही प्राप्त होगी, न किसी तकनीकी कानून से।

इसी के साथ उन्हें अपनी पहचानगत दुराग्रहों से भी मुक्त होना होगा, तब जाकर ही उन्हें वास्तविक सामाजिक शक्ति प्राप्त होगी। आज न सर्वोच्च अदालत और न ही कोई राजनीतिक दल उनके विरुद्ध कोई कदम उठा सकता है, क्योंकि भारतीय लोकतंत्र में जिसके पास अपनी जाति का वोट ज्यादा है, उसी के पास सौदेबाजी की क्षमता है और उसी की राजनीतिक ताकत भी है।

यह ताकत हिंसक प्रदर्शन के जरिये ही व्यक्त नहीं की जानी चाहिए। इस जोर से तो फैसला नहीं बदलवाया जा सकता, जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय ने सही ही स्पष्ट कर दिया है।