सवालों के बरक्स

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राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करने की दृष्टि से बहुत ही निर्णायक समझा जाने वाला कर्नाटक विधानसभा के चुनाव में एक नई और नकारात्मक प्रवृत्ति उभर रही है, जो चुनाव आयोग के लिए गंभीर चुनौती साबित हो सकती है। राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता ऐसे मतदाताओं को रिश्वत देने की कोशिश कर रहे हैं, जिनके बारे में उनका सहज अनुमान है कि वे अपनी राजनीतिक विचारधारा के कारण उन्हें अपना वोट नहीं देंगे।

मतदाताओं को ललचा कर या घूस देकर वोटर कार्ड खरीदने की यह नई कला विकसित हो रही है, जो चुनाव की निष्पक्षता के साथ-साथ भारतीय लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करेगा। कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरू के राज राजेरी इलाके के एक फ्लैट से बरामद दस हजार वोटर आईडी कार्ड धांधली और फर्जीवाड़े की नई कला का संकेत है। वोटर आईडी कार्ड की कीमत अलग-अलग है।

उत्तरी कर्नाटक के सुदूर इलाके में मतदाताओं को सौ रुपये देकर उसका वोटर आईडी कार्ड हासिल किया जा रहा है, जबकि बेंगलुरू की झोपड़पट्टियों में इसके बदले दो हजार रुपये की रिश्वत दी जा रही है। हालांकि चुनाव आयोग ने आस्त किया है कि वोटों की चोरी आसान नहीं है और इस बात पर हमारी कड़ी नजर रहेगी कि किसी व्यक्ति विशेष या किसी भी समुदाय के लोगों को मतदान करने से कोई रोक नहीं पाए।

अगर चुनाव में धांधली और फर्जीवाड़ा पाया गया तो हम मतदान रद्द कर देंगे। दरअसल, भारत जैसे गरीब और पिछड़े देश के मतदाताओं को राजनीतिक दल मामूली रिश्वत देकर उनका वोट खरीदने में सफल हो जाते हैं। पिछले कुछ वर्षो से चुनाव आयोग की सतर्कता के कारण एक हद तक निष्पक्ष हो भी रहे हैं। लेकिन अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।

इसलिए चुनाव आयोग के इस आासन के बावजूद कर्नाटक में धांधली और फर्जीवाड़े से इनकार नहीं किया जा सकता। सियासी दलों का कार्यकर्ता अपने उम्मीदवारों के पक्ष में वोट देने के लिए मतदाताओं को रुपया-पैसा और शराब बांटा करते हैं, मगर अब वोट नहीं देने के लिए रिश्वत देने की नई प्रवृत्ति से आयोग कैसे निपटेगा, यह देखने वाली बात होगी।

चुनाव आयोग के साथ-साथ राजनीतिक दलों का भी यह लोकतांत्रिक कर्त्तव्य है कि चुनाव निष्पक्ष हो, लेकिन कांग्रेस और भाजपा दोनों सत्ता के लिए लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर कर रही हैं। इसके दुष्परिणाम जल्द ही देश के सामने आएंगे।