सबरीमाला : चलिये संविधान के साथ

डा. अजय तिवारी,

आधुनिकता की एक पहचान यह है कि समाज पर धार्मिंक संस्थाओं की जगह राजनीति के नियम चलते हैं। धर्म का प्रभुत्व मध्यकालीनता की पहचान है। कबीर-जायसी-तुलसी के समय से राममोहन राय-विवेकानंद-गांधी और स्वाधीनता आंदोलन तक हमारे समाज ने आधुनिकता की जो यात्रा की थी, वह पिछले दो दशकों में वापस मध्ययुगीनता की ओर लौट पड़ी है। इसका परिणाम यह है कि भक्ति आन्दोलन से स्वाधीनता आंदोलन तक समाज सुधार और धर्म सुधार की जो लहर चली, वह एकाएक ठप हो गयी, गुफाओं-कंदराओं से निकलकर साधु-संन्यासी संसद और विधानसभाओं की ओर दौड़ लगाने लगे। वे केवल के धर्म के नहीं, समाज के मामलों में भी निर्णय और आदेश देने लगे। धर्म का इस्तेमाल करने वाली राजनितिक शक्तियों ने इस परिस्थिति का लाभ उठाया और उसे हवा दी। स्थिति यह उत्पन्न हो गयी कि चुनाव के लिए भी मंदिर-मस्जिद का मुद्दा खुलेआम इस्तेमाल किया जाने लगा। इससे न केवल धर्मसुधार की परंपरा का लोप हुआ और धार्मिंक कट्टरता को बल मिला, बल्कि संविधान की मूल प्रतिज्ञा-धर्मनिरपेक्षता-की भी क्षति हुई। जिन राजनीतिक शक्तियों को इससे लाभ हुआ, वे धर्म की भावना का इस्तेमाल करने और उसे भड़काने में विशेष सक्रिय हुए। पिछले दिनों केरल के सबरीमाला मंदिर में रजस्वला महिलाओं के प्रवेश की अनुमति देकर सर्वोच्च न्यायालय ने सुधार की भावना को प्रतिबिंबित किया, लेकिन धर्म की राजनीति करने वालों ने इसमें अपने लिए ध्रुवीकरण का सामान प्राप्त कर लिया।
मामला यह है कि इंडियन यंग लायर्स एसोसिएशन ने सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर करके सबरीमाला मंदिर की सदियों से चली आ रही एक प्रथा को चुनौती दी। इस प्रथा के अनुसार दस वर्ष से पचास वर्ष तक की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं है। सभी पक्षों की सुनवाई के बाद न्यायालय ने यह प्रतिबंध हटा दिया। उसने संविधान की भावना के अनुरूप निर्णय किया। किसी भी व्यक्ति को पूजा के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता; कानून की नजर में ही नहीं, भगवान की नजर में भी कोई श्रेष्ठ और कोई हीन नहीं है; किसी भी आधार पर नागरिकों में भेदभाव करना सभ्य तरीका नहीं है। न्यायालय का दृष्टिकोण समाज सुधार की महान परंपरा के अनुकूल है। लेकिन यह धर्म की कट्टरता का दौर है। तुष्टिकरण और ध्रुवीकरण की राजनीति के कारण सभी धर्मो के कट्टरपंथी किसी कानून, किसी सामाजिक सद्भाव को मानने के लिए तैयार नहीं है। अब समाज की करवट से धर्म में बदलाव नहीं होता, धर्म की जड़ता से समाज का कायाकल्प होता है। देखने की बात है कि सुधार की भावना को सर्वोच्च न्यायालय का आदेश प्रतिबिंबित करता है, भेदभावमूलक नियमों को बनाए रखने में पण्डे-पुजारी और सामंती तत्वों के साथ ही धर्म को राजनीति में घोलने वाली शक्तियां काफी आक्रामक रूप में सक्रिय हैं। यह संयोग की बात नहीं है कि सर्वोच्च न्यायालय में संशोधन याचिका दायर करने का काम पुजारियों और राजपरिवार के सदस्यों ने किया है, इससे धर्म और सामंतवाद का गठबंधन स्पष्ट होता है; और न्यायालय के आदेश के विरुद्ध पांच दिनों की यात्रा भाजपा ने आयोजित की है, जो चुनाव के पहले राममंदिर के मुद्दे को बड़े पैमाने पर हवा दे रही है।
अफसोस यह है कि गांधी और नेहरू की कांग्रेस भी अब सुधार की चेतना बहुर दूर जा चुकी है जो जनता के विश्वास का उपयोग करते हुए समाज सुधार के रस्ते पर चलती थी और रूढ़िवाद का खंडन करती थी। अब वह राजनीतिक लाभ के लिए ‘नरम हिंदुत्व’ का इस्तेमाल कर रही है। इसलिए केरल में हिन्दू भावनाओं को उकसाने में वह भी सक्रिय सहयोग कर रही है। वहां की वामपंथी सरकार ने पुनर्विचार याचिका न दायर करने निर्णय लिया है। केरल के मुख्यमंत्री ने न्यायालय का निर्णय लागू करने के प्रति वचनबद्धता प्रकट की है। इस बात के लिए पण्डे-पुजारी और राजपरिवार के लोग ही नहीं, भाजपा और कांग्रेस भी उसकी आलोचना कर रहे हैं। इन सभी को वामपंथी सरकार के विरु द्ध धर्म का हथियार मिल जाने का संतोष मालूम होता है। इसमें संदेह नहीं कि वामपंथी सरकार के लिए धर्म का यह प्रसंग एक गंभीर चुनौती बनकर उभरा है। परीक्षा की इन घड़ियों में राजनीतिक दलों की भी परख होती है। वे केरल के महान सुधार आंदोलनों की परंपरा को आगे ले चलेंगे या उन सुधारों को धूल में मिला देंगे, यह सबसे बड़ा प्रश्न है। अपने रूढ़िवादी दायरे में सिमटकर धर्म किस पतन की दशा में पहुंचते हैं, यह आज सभी धर्मो में देखा जा सकता है। क्या हिन्दुओं के धर्मगुरु  और मठाधीश और क्या मुसलमानों या ईसाइयों के पुजारी, सभी संपत्ति के अपहरण और महिलाओं के शोषण के मामलों में पर्याप्त यशस्वी हो रहे हैं। सभी जगह एक दबी-सी आवाज सुधारकों की भी मुखरित हो रही है, जिसे सामंतों-पुजारियों और राजनीतिज्ञों के गठजोड़ के नीचे दबाने का भरसक प्रयत्न हो रहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस सुधार की वाणी को बल प्रदान किया है।
सबरीमाला में प्रवेश के खिलाफ बहुत-सी महिलाएं सड़कों पर उतरी हैं।  कुछ दिन पहले महाराष्ट्र के शनि शिगनापुर के गर्भगृह में महिलाओं के प्रवेश की अनुमति देकर सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसे ही विवाद को जन्म दिया था। तब भी कुछ महिलाएं विरोध में उतरी थीं। संसद द्वारा तीन तलाक के कानून के विरु द्ध भी बहुत-सी महिलाएं प्रदर्शन में शामिल थीं। एक तो पितृसत्ता का वर्चस्व और दूसरे राजनीतिक पक्षधरता का असर, इन कारणों से कुछ महिलाओं को सड़क उतरना कठिन नहीं है। लेकिन मनुष्य के रूप में समानता की आकांक्षा महिलाओं में न होगी, यह सोचना एक असभ्य विचार है। खुद सर्वोच्च न्यायालय में दो विचारों का आना यह बताता है कि आज के हालत में कोई निर्णय आसान नहीं है। न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा का विचार था कि धार्मिंक स्वतंत्रता के मामलों में दखल न देना चाहिए, न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ का कहना था कि महिलाएं भगवन की नजर में कमतर नहीं हैं। इस तरह, धार्मिंक स्वतंत्रता बनाम पूजा का समान अधिकार-यह समस्या अदालत के सामने भी थी। लेकिन अदालत ने संविधान की भावना, आधुनिक जीवन मूल्य और सुधार आंदोलनों की परंपरा के अनुकूल रुख अपनाया। यह अब व्यापक समाज को तय करना है कि देश किस तरफ जाएगा-भेदभावपूर्ण नियमों से परिचालित मध्ययुगीन अंधकार की तरफ या सभ्यता से अर्जित मानवीय समानता की तरफ; समाज का नियंतण्रपण्डे-पुरोहित करेंगे या कानून; जाति-धर्म-लिंग के आधार पर दमन की परिपाटी चलेगी या स्वेच्छा पर आधारित स्वस्थ भविष्य निर्मिंत होगा! सबरीमाला के विवाद ने हमारे समाज और राजनीति के सामने यह प्रश्न बड़े उत्कट रूप में फिर उपस्थित कर दिया है।