सपोर्ट में कटौती

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सरकार ने पिछले सप्ताह पाकिस्तान को ‘कोलिजन सपोर्ट फंड’ के नाम से दी जानेवाली तीन हजार करोड़ डॉलर की आर्थिक मदद रोकने की घोषणा की है।

ट्रंप प्रशासन ने यह फैसला ऐसे समय किया है, जब अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोंपियो पाकिस्तान के दौरे पर जाने वाले हैं। दूसरी ओर, नई दिल्ली में इसी हफ्ते भारत और अमेरिका के बीच ‘टू प्लस टू डायलॉग’ होने जा रहा है, जिसमें कूटनीतिक और सुरक्षा से संबंधित मुद्दों पर पारस्परिक भागीदारी बढ़ाने पर चर्चा होगी।

इसमें अमेरिकी विदेश मंत्री पोंपियो, रक्षा मंत्री जेम्स मेरिस अपने भारतीयों समकक्षों के साथ कूटनीतिक-सामरिक विमर्श में शामिल होंगे। जाहिर है कि ये दोनों घटनाएं महज संयोग है, लेकिन पाकिस्तान के कूटनीतिक हलकों में अपने सुविधानुसार इसकी व्याख्या की जा रही है। कहा जा रहा है कि यह भारत को प्रसन्न करने के लिए अमेरिका ने पाकिस्तान की आर्थिक मदद में कटौती की है। यह भी कि उसके रक्षा उपकरण खरीदने के लिए, ईरान से ईधन आपूर्ति न करने और रूस से लड़ाकू विमानों के प्रस्तावित सौदे पर भारत को आगे बढ़ने से रोकने के लिए ऐसा लालच अमेरिका की तरफ से दिया जा रहा है।

हो सकता है ये भी कारण हो। पर इसके अलग विशिष्ट संदर्भ भी हैं। सच तो यह है कि 2002 से आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक लड़ाई में पाकिस्तानी सहयोग के लिए अमेरिका यह धनराशि उसे दे रहा है। लेकिन अमेरिकी रक्षा विभाग का निष्कर्ष है कि पाकिस्तान आतंकी गुटों के खिलाफ कार्रवाई करने में असफल रहा है। लिहाजा यह मदद रोकी जा रही है।

राष्ट्रपति ट्रंप ने पाकिस्तान पर यह आरोप लगाया है कि वह अमेरिका से आतंकवाद को नेस्तनाबूद करने के  नाम पर अरबों डॉलर की राशि लेकर उसे धोखा दे रहा है। दरअसल, पाकिस्तान आतंकवाद का इस्तेमाल रणनीतिक औजार के तौर पर करता है और भारत में सक्रिय आतंकी समूहों की मदद करना पाकिस्तानी राज्य की अघोषित नीति है।

इसके कारण उसकी अर्थव्यवस्था बुरी तरह चरमरा गई है। इमरान सरकार के लिए देश को आर्थिक और वित्तीय संकट से उबारना बहुत बड़ी चुनौती है। इसलिए पाकिस्तान की नागरिक सरकार और सैन्य प्रतिष्ठान को आतंकवाद को समर्थन देने की नीति को परित्याग करना होगा, क्योंकि अब वह अमेरिका की आंख में धूल नहीं झोंक सकता।