संतुलित नजरिया अपनाएं

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मी टू अब जंगल की आग की तरह फैल रहा है। हालांकि अभी भी उतनी बड़ी संख्या में मामले आए नहीं हैं जितनी मीडिया में इसकी चर्चा हो रही है। कुल जमा आठ से दस आरोप। हो सकता है कुछ और ऐसे ही सनसनीखेज आरोप हमारे सामने आए। मी टू को अब शी टू, ही टू और यू टू में परिणत कराने की कोशिश हो रही है। केंद्रीय मंत्री एमजे अकबर का नाम आने के कारण यह राजनीति का भी मुद्दा बन गया है।

एक महिला पत्रकार ने उन पर भी महिला पत्रकारों के यौन शोषण का अभ्यस्त होने का आरोप लगा दिया है। उनके इस्तीफा तक की मांग हो रही है। प्रश्न है कि इसे किस रूप में देखा जाए? हमारा मानना है कि देश में ऐसी स्थिति होनी चाहिए, जिसमें किसी लड़की या महिला को जीवन-यापन का उपयुक्त अवसर पाने या अपनी प्रतिभा को दर्शाने के लिए शरीर शोषण का सामना न करना पड़े। ऐसी स्थिति का न होना किसी भी सभ्य समाज पर कलंक है। यह भी सच है कि गांवों से लेकर कस्बों और शहरों तक लड़कियों/महिलाओं की ऐसी बड़ी संख्या होगी, जिनको कभी-न-कभी यौन दुराचार का शिकार होना पड़ा है।

राजनीति से साहित्य, कला, फिल्म, टेलीविजन और मीडिया ही नहीं आम जनजीवन में ऐसी पीड़ित महिलाएं हैं। यह हमारे समाज का एक क्रूर सच है। किंतु वर्तमान अभियान में अभी तक ज्यादातर उच्च मध्यम वर्ग या सोशलाइट माने जाने वाली कुछ महिलाएं ही सामने आई हैं, जिनमें से ज्यादातर मुक्त यौनाचार की वकालत करती रहीं हैं। हालांकि मुक्त यौनाचार का अर्थ यह नहीं कि कोई किसी को इसके लिए मजबूर करे। ऐसा हुआ है तो यह अपराध है और वैसे पुरु ष के खिलाफ कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। किंतु यह नहीं हो कि एक समय आपके संबंध बहुत अच्छे थे, आपने सहमति से सहवास किया और आगे जब संबंध खराब हो गए तो आप उसे यौन शोषण का मामला बना दें।

अगर कोई महिला/लड़की आरोप लगा दे तो उस पुरु ष का कोई स्पष्टीकरण हम सुनने के लिए तैयार नहीं होते। यह स्थिति भी ठीक नहीं। अगर किसी महिला को अपने साथ हुए यौनाचार के लिए न्याय मांगने का अधिकार है तो पुरु ष को भी अपना पक्ष रखने का अधिकार है। कोई निष्कर्ष निकालने के लिए पहले हमें दोनों पक्ष को सुनना चाहिए।

न्याय सबके लिए समान है। अगर महिला/लड़की को यौन दुराचार में इंसाफ चाहिए तो किसी पुरु ष को बदनाम करने या किसी अन्य कारण से आरोपित किया गया है तो इंसाफ की जरूरत उसे भी है।