संघ का बुलावा

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भारतीय राजनीति में देश के विभाजन और संविधान निर्माण की प्रक्रिया के साथ ही साम्प्रदायिकता, धर्मनिरपेक्षता और छद्म धर्मनिरपेक्षता जैसे गंभीर मसलों पर वाद-विवाद और विमर्श की शुरुआत हो गई थी। लेकिन राम मंदिर आंदोलन के साथ ही इन जटिल मुद्दों पर विचार मंथन की प्रक्रिया को गति मिली और संसद में भी इन सवालों पर सार्थक बहसें हुई। निस्संदेह भारतीय समाज और राजनीति में आरएसएस और भाजपा की हिन्दू प्रेरित विचार की स्वीकृति जैसे-जैसे बढ़ती गई, वैचारिक मंथन की प्रक्रिया भी तेज हुई है। आरएसएस द्वारा आयोजित तीन दिवसीय व्याख्यानमाला में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, माकपा के महासचिव सीताराम येचुरी सहित अलग-अलग विचारधारा के नेताओं को आमंत्रित किया जाना पिछले तीन दशकों से भारतीय समाज में जारी विचार मंथन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के रूप में देखा जाना चाहिए। अब इस वैचारिक मंथन से भारतीय समाज और राजनीति को अमृत मिलेगा या विष यह तो समय ही बताएगा, लेकिन इतना तय है कि संघ ने राहुल गांधी और सीताराम येचुरी को आमंत्रित करके गेंद उनके पाले में डाल कर प्रारम्भिक राजनीतिक  लड़ाई जीत ली है। यह भी महज संयोग है कि व्याख्यानमाला में राहुल गांधी को आमंत्रित करने की खबर ऐसे समय में आई है, जब उन्होंने इस संगठन की तुलना कट्टरपंथी संगठन मुस्लिम ब्रदरहुड से की है। आरएसएस ने इसके लिए राहुल की कड़ी आलोचना करते हुए कहा है कि वह संघ को समझ नहीं सकते, क्योंकि वे भारत को समझ नहीं सकते। राहुल गांधी बहुधर्मी, बहुभाषी और बहु-सांस्कृतिक भारत को समझते हैं या नहीं, यह तो नहीं कहा जा सकता। लेकिन उनका पूर्ववर्त्ती नेतृत्व और वामपंथी दलों ने इस देश को समझने में भूल की है। इन्होंने धर्मनिरपेक्षता की जैसी एकतरफा व्याख्या की है, उसी का नतीजा है कि हिन्दू-मुस्लिम दोनों समुदायों में कट्टरता का उभार हुआ है। बेहतर होगा कि राहुल गांधी संघ के आमंतण्रको स्वीकार करें और अगर वह इस संगठन को कट्टरपंथी मानते हैं तो उसकी कट्टरता से लड़ने का विचार और कार्यक्रम पेश करें। जून में पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भी संघ के मुख्यालय नागपुर में राष्ट्रवाद पर अपना नजरिया पेश किया था। राहुल भी व्याख्यानमाला की थीम ‘भारत का भविष्य : आरएसएस के परिप्रेक्ष्य में’ संघ के नजरिये के साथ अपना दृष्टिकोण पेश करें।