संकट नहीं पर सावधानी

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एक डॉलर के बदले सत्तर रुपये तक मिलने लगे, इसे रुपये की ऐतिहासिक निचाई कह सकते हैं। यानी एक डॉलर के मुकाबले ज्यादा रुपयों की दरकार होगी। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार में भीषण उठापटक मची हुई है। तुर्की की मुद्रा लीरा की गिरावट के चलते अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार में अनिश्चितता पैदा हो गई है।

जब भी अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अनिश्चितता पैदा होती है, उसका एक परिणाम यह होता कि डॉलर मजबूत हो जाता है। डालर के मुकाबले भारतीय रु पया जनवरी से अब तक करीब नौ प्रतिशत गिर चुका है। इसका मतलब यह हुआ कि जिन आइटमों का भुगतान भारत को डॉलर की शक्ल में करना होता है, उनके लिए ज्यादा खर्च करने होंगे। यानी कुल मिलाकर आयात महंगे होंगे।

भारत कच्चे तेल के आयात में बहुत डॉलर खर्च करता है। कच्चा तेल महंगा होगा तो देश में तेल से जुड़े तमाम उत्पाद महंगे होंगे। लैपटॉप, मोबाइल के बड़े हिस्से आयात होते हैं। यानी लैपटाप और मोबाइल भी महंगे होंगे। हां निर्यातकों का बहुत फायदा होगा, 100 डॉलर का निर्यात करके निर्यातक पहले 6400 रु पये कमाता था, अब बैठे बिठाये उसे 7000 रुपये मिल जाएंगे।

पर कुल मिलाकर निर्यातकों का फायदा होगा पर समूची अर्थव्यवस्था निर्यातक नहीं है। महंगाई का दंश अर्थव्यवस्था को झेलना पड़ेगा। गिरते रुपये को संभालने का एक तरीका यह है कि रिजर्व बैंक बाजार में डॉलर डाले यानी डॉलर की आपूर्ति बढ़ाए। डॉलर की आपूर्ति बढ़ेगी तो डॉलर के मुकाबले रुपया संभलेगा। पर डॉलर बाजार में डालने का एक आशय यह भी है कि भारत के विदेशी मुद्रा कोष के डॉलर भंडार में कमी होगी।

3 अगस्त 2018 को रिजर्व बैंक का विदेशी मुद्रा कोष करीब 403 अरब डॉलर का था। मार्च अंत के मुकाबले इसमें करीब 22 अरब डॉलर की कमी आई। यानी रिजर्व बैंक के दखल की एक सीमा है। अंतत: निर्यात को बढ़ाना होगा और आयात को नियंत्रित करना होगा।

भारत के पास करीब 400 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा कोष है, सो संकट की स्थिति नहीं है। हां, 72वें स्वतंत्रता दिवस पर अपनी अर्थव्यवस्था की उपलब्धियां गिनाते वक्त मोदीजी को यह नहीं भूलना चाहिए कि गिरता रुपया उनके सामने बहुत बढ़ी हुई चुनौतियां पेश कर रहा है।