शंका निवारण करे

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इंडस्ट्रियल डवलपमेंट बैंक ऑफ इंडिया यानी आईडीबीआई को बचाने की सरकार की कोशिशों का विपक्ष ने जिस तरह विरोध किया है, उस पर सरकार का स्पष्टीकरण आवश्यक है। कांग्रेस का कहना है कि इस बैंक को बचाने के लिए सरकार भारतीय जीवन बीमा निगम को निवेश करने के लिए मजबूर कर रही है, जो गलत है।

इससे निगम में धन जमा करने वाले आम आदमी के लिए जोखिम बढ़ जाएगा। हालांकि कांग्रेस का यह आरोप तथ्यों से परे है कि आईडीबीआई की हालत मोदी सरकार के कार्यकाल में खराब हुई। मनमोहन सरकार के समय ही इस बैंक की स्थिति डांवाडोल हो चुकी थी। कोई बैंक संकट में मुख्यत: दो कारणों से आ सकता है। एक, उसके दिए गए कर्ज की वापसी नहीं हो। यानी जिनने कर्ज लिया वह समय से किश्त न अदा करें। और दो, उसके पास जमाकर्ताओं और कर्ज लेने वालों की संख्या अत्यंत कम हो। भारत के ज्यादातर बड़े बैंकों के साथ दूसरे कारक लागू नहीं होते।

इस बैंक को उबारने के लिए पूर्व सरकार ने भी कई बार कोशिशें की। लेकिन यह फिर से सक्षम होकर अपना काम करे इसके लिए जितने कदम उठाए जाने चाहिए थे, नहीं उठाए गए। आप थोड़ी सी वित्तीय मदद कानून के दायरे में रहकर कर दें उससे बैंक संकट से नहीं उबर सकते। उनके लिए कई स्तरों पर काम करना पड़ता है जिसमें वित्तीय पैकेज एक है।

मोदी सरकार को ज्यादातर बैंकों का एनपीए विरासत में मिला है। पर उन्हें इनका निदान निकालना जरूरी है। इस दिशा में अनेक कदम उठाए गए हैं। बैंकों का विलय भी उसी कड़ी का अंग है। आरबीआई ने सभी बैंकों से एनपीए का पूरा हिंसाब मांगा है ताकि स्थिति स्पष्ट हो सके। बैंकों के उच्च प्रबंधन एवं कार्यशैली में बदलाव के नियम बनाए गए। सक्षम बकाएदारों से वसूली के लिए कदम उठाए गए हैं, जिनमें कंपनियों की बिक्री भी शामिल है।

भूषण स्टील इसका उदाहरण है। फिर उसके लिए एकमुश्त राशि की व्यवस्था भी की जा रही है। वित्त मंत्री ने काफी पहले कहा था कि बैंकों की पुनपरूंजीकरण के लिए सवा दो लाख करोड़ रुपये की व्यवस्था की जा रही है। इसमें एक रास्ता यह है सार्वजनिक क्षेत्र की बीमा कंपनियों को कुछ निवेश करने के लिए कहा जाए। इसी के तहत एलआईसी को तैयार किया गया है। किंतु इसमें गलतफहमी न हो इसलिए सरकार को पूरा विवरण देना चाहिए।