विश्वसनीयता का तकाजा

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सीबीएसई के 16 लाख छात्रों की खुशी क्षण भर में ही काफूर हो गई। परीक्षा खत्म होने के कुछ ही घंटे बाद यह ऐलान हुआ कि दसवीं की गणित और बारहवीं की अर्थशास्त्र की परीक्षा दोबारा से ली जाएगी। यह उस शिक्षा बोर्ड का हाल है, जिसने अपनी चाक-चौबंद व्यवस्था से ख्याति पाई। लेकिन पिछले कुछ सालों में सीबीएसई में सेंधमारी हुई है। यहां कुछ भी संतोषजनक नहीं कहा जा सकता है।

चौंकाने वाली बात यह है कि परीक्षा के एक दिन पहले ही हाथ से लिखे प्रश्नपत्र व्हाट्सएप के जरिये सार्वजनिक हो गए। और इसकी जानकारी मिलने के बावजूद सीबीएसई लाचार और मूकदर्शक बनी रही। अब जबकि कांड हो चुका है; मंत्रालय आगे से होने वाली परीक्षाओं को फूलप्रूफ करने का दावा कर रहा है। मगर सवाल यही कि जिस लीकप्रूफ व्यवस्था लागू करने की बात मंत्रालय कर रहा है, वह पहले से क्यों अमल में लाई गई।

जबकि बोर्ड के दामन पर पहले से ही कई दाग लगे हैं। चाहे वह 2011 में अंडमान क्षेत्र में 12वीं का भौतिक, रसायनशास्त्र और 10वीं का गणित का पेपर लीक का मामला हो या उसी साल अखिला भारतीय इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा (एआईईईई, वर्तमान में जेई मेन) का पर्चा लीक का। इससे पहले 2004 में ऑल इंडिया प्री मेडिकल एंट्रेंस एग्जामिनेशन (एआईपीएमटी, वर्तमान में नीट) का पेपर लीक हुआ था।

चिंता का विषय यह कि एक के बाद एक लापरवाही के बावजूद बोर्ड का रवैया बेहद चलताऊ किस्म का रहा। यानी पिछली सभी घटनाओं से बोर्ड ने रत्ती भर भी सबक नहीं सीखा। अब दसवीं और बारहवीं के पेपर लीक के बाद सरकार झेंप मिटाने के लिए नई तकनीक के साथ परीक्षा कराने की बात कह रही है। बोर्ड की अर्कमण्यता की कीमत लाखों छात्रों और अभिभावकों को भुगतनी पड़ेगी।

सरकार को इस विषय में त्वरित जांच कर दोषियों को फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन कर सजा दिलाने का काम करना होगा। यह मामला बेहद संजीदा है। मंत्रालय को इस बात का भरोसा भी छात्रों को दिलाना होगा कि पुर्नपरीक्षा को लेकर किसी तरह की चिंता या तनाव करने की जरूरत नहीं है। यह छात्रों के भविष्य से जुड़ा मसला है।

सरकार को इसके साथ ही प्रश्नपत्रों के मल्टीपल सेट तैयार कर रखने के बारे में विचार करना होगा। वहीं कंप्यूटर आधारित परीक्षा प्रणाली भी ऐसे वक्त में कारगर साबित हो सकती है। यह सब कुछ ज्यादा विसनीय और पारदर्शी तरीके से करना ही एकमात्र विकल्प है।