विश्लेषण : शून्य में सामाजिक एकता

अवधेश कुमार,

भारत की वर्तमान दशा किसी भी विवेकशील व्यक्ति को भयभीत कर सकती है। अप्रैल से अब तक तीन भारत बंद हो गया और आज चौथा है। तीन पूरी तरह गैर दलीय बंद रहे हैं और तीनों की जड़ एक ही जगह सन्निहित थी-अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण कानून। पहला बंद 2 अप्रैल को दलितों के नाम पर बुलाया गया था। वह कितना हिंसक था यह हम सबने देखा।
10 अप्रैल को केवल सोशल मीडिया पर आह्वान मात्र से बंद हो गया। उसके बाद 6 सितम्बर का बंद। पहला सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनुसूचित जाति-जनजाति निवारण कानून में प्राथमिकी, गिरफ्तारी और जमानत के प्रावधान में लाए गए बदलाव के विरुद्ध था। सर्वोच्च न्यायालय के विरु द्ध भारत में शायद यह (2 अप्रैल) पहला बंद आयोजित हुआ और किसी राजनीतिक दल ने इसको गलत ठहराने का साहस नहीं किया। 10 अप्रैल का बंद इसकी प्रतिक्रिया में था। 6 सितम्बर को संसद द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को पलटने और कानून में थोड़ा बदलाव के विरु द्ध बंद आयोजित हुआ। 10 सितम्बर का भारत बंद कांग्रेस की ओर से हुआ और यह पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस के मूल्यों में वृद्धि के खिलाफ है। यह बंद सामान्य तौर पर भयभीत करने वाली नहीं मानी जा सकती। विपक्ष में होने के कारण उसकी मुख्य भूमिका सरकार को घेरने की है। किंतु समय अवश्य चिंताजनक है, क्योंकि देश में सबसे ज्यादा लंबे समय तक शासन करने वाली पार्टी को यह समझना चाहिए था कि इस समय पैदा हो रहे सामाजिक तनाव को कम करने के लिए हरसंभव यत्न करने की आवश्यकता है।
वास्तव में ये दोनों स्थितियां भयभीत करने वाली हैं। जिनको 1990 याद हो, उनके अंदर अवश्य सिहरन पैदा हो रही होगी। विनाथ प्रताप सिंह सरकार द्वारा मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने के बाद पूरा देश हिंसा में जल उठा था। सरकार ने लागू तो कर दिया लेकिन उससे उठने वाली ज्वाला को बुझाने का उसने कोई पूर्वोपाय किया ही नहीं, क्योंकि उसका उसे इल्म ही नहीं था। विनाथ प्रताप पिछड़ों के परित्राता के रूप में अमर होने का ख्वाब पाले हुए थे। जब हिंसा होने लगी, नौजवान आत्मदाह करने लगे तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। यह मायने नहीं रखता कि उसके बाद राजा मांडा की राजनीति में कोई हैसियत नहीं रही। उस दौर से बाहर निकलने में देश को दो दशक से ज्यादा लग गए। देश विखंडित राजनीति और बहुमतविहीन संसद एवं राज्य विधायिकाओं में फंसा रहा। उससे नेताओं का एक ऐसा दौर आरंभ हुआ, जिनकी दृष्टि सिर्फ  जातीय तनाव और विभाजन पैदा कर अपनी राजनीति साधने पर रही। जातियों को खत्म करने की धारा से निकले नेता मंडल के बाद जातियों के नेता बन गए। हालांकि राजनीतिक दंश जारी रहने के बावजूद समाज ने धीरे-धीरे अपने को संभाला लेकिन सतह के अंदर से तनाव पूरी तरह खत्म हो गया हो ऐसा नहीं माना जा सकता। हमारी चिंता के मूल में समाज की एकता है। बाहर और भीतर की अनेक शक्तियां देश की एकता को कई प्रकार से कमजोर करने के लिए सक्रिय हैं।
निस्संदेह, राजनीतिक पार्टयिों की भूमिका हमारी चिंता को बढ़ा देतीं हैं। संसद अगर बहस के लिए है तो फिर ऐसा आतंककारी माहौल बना देने का क्या मतलब है जहां कोई सांसद सच बोलने का साहस न कर सके? सामान्य लोकतांत्रिक आचरण तो यही था कि न्यायालय के फैसलों के आधार पर पहले बहस हो। उसके बाद इसमें बदलाव करने का निर्णय लिया जाना चाहिए था। मंडल आयोग के अनुभवों से सीख लेते हुए इसकी घातक प्रतिध्वनियों का पूर्व आकलन भी करना आवश्यक था। नेताओं और पार्टयिों ने माहौल ऐसा बना दिया मानो, जिसने फैसले को पलटने के परे कुछ बोला वो अनुसूचित जाति-जनजाति विरोधी। कोई नेता, जिसे चुनाव लड़ना हो ऐसी छवि पाने का जोखिम नहीं ले सकता। इससे ज्यादा भयभीत करने वाली कोई स्थिति हो ही नहीं सकती जहां शांति से विवेकसम्मत विमर्श करना संभव न रहे। अगर राजनीतिक प्रतिष्ठान में खुलकर बात करने की स्थिति नहीं तो निर्णय में भी विवेक परिलक्षित नहीं हो सकता है। आखिर यह कैसी स्थिति थी, जिसमें दोनों सदनों में कोई माननीय सदस्य यह तक कहने का साहस नहीं कर पाए कि हमें कोई निर्णय करने के पूर्व जनता को विश्वास में लेने की कोशिश करनी चाहिए..इसके परिणामों का आकलन कर उससे निपटने का पूर्वोपाय करना चाहिए..। स्थिति में अभी तक कोई अंतर नहीं आया है।
देश का वातावरण बिगड़ रहा है, लेकिन न तो सरकार न विपक्ष विरोध में खड़े समूहों से संवाद करने को तैयार है। 6 सितम्बर के बंद पर सरकार कह रही है कि विपक्ष इस विरोध के पीछे है तो विपक्ष कह रहा है कि सरकार जान-बूझकर बंद और विरोध करा रही है ताकि इसका राजनीतिक लाभ वह उठा सके। ऐसे हर विरोध और बंद के पीछे राजनीति होती है लेकिन यह संभव नहीं कि इतना व्यापक विरोध किसी राजनीतिक दल के द्वारा पैदा कर दिया जाए। प्रधानमंत्री सभी राजनीतिक दलों की बैठक बुला सकते थे, राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक कर सकते थे..विरोध करने वाले समूहों के नेताओं से मुलाकात और बातचीत की शुरुआत हो सकती थी। भाजपा की दिल्ली में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी से देश इस बारे में कुछ सुनने की उम्मीद कर रहा था मगर बयान आया तो चुनाव जीतने का। कांग्रेस भी राफेल और तेल तक सीमित है। साफ है कि दलों से हम पैदा हो रहे सामाजिक तनाव के खतरे को खत्म करने के लिए काम करने की उम्मीद नहीं कर सकते। तो फिर किया क्या जाए? एक रास्ता यह हो सकता है कि सभी जाति वगरे के प्रभावी लोग राष्ट्रीय स्तर से लेकर नीचे तक एक औपचारिक समूह बनाकर सामने आएं और मिलकर लोगों से सामाजिक एकता बनाए रखने की अपील करें, उसके लिए सजग रहें, उनके बीच जाएं, बातें करें..तो असर हो सकता है।
दूसरे, अगर कहीं अनु. जाति-जनजाति कानून के तहत मुकदमा हो तो अपने स्तर पर भी उसे देखने की कोशिश करें कि वाकई अत्याचार हुआ है या मामला झूठा है। यह प्रक्रिया जितनी सशक्त होगी समाज का तनाव उतना ही कम होगा। साथ ही इससे राजनीतिक पार्टयिों पर भी वोट की राजनीति से बाहर आकर विवेकशील कदम उठाने का दबाव बढ़ेगा।