विवेक खोती प्रवृत्ति

,

बिहार इन दिनों छोटी बच्चियों और महिलाओं के विरुद्ध यौन शोषण और हिंसा की अनचाही खबरों को लेकर लगातार सुर्खियों में है। ताजा वारदात सुपौल जिले में स्थित दरपखा गांव के कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालय की है, जहां डरपोक, मनचले और शोख स्थानीय युवकों ने इस स्कूल की 12-14 साल की बहादुर छात्राओं पर उनके छात्रावास में घुसकर हमला किया।

इस हमले में करीब 40 छात्राएं घायल हुई हैं। इस घटना का सबसे अफसोसनाक पहलू यह है कि हमलावरों में मनचले युवकों के साथ उनके मां-बाप भी शामिल थे। इन छात्राओं की गलती इतनी भर थी कि इन शोहदे किस्म के लड़कों की अश्लील हरकतों और स्कूल की दीवारों पर उनके द्वारा लिखी गई अशिष्ट टिप्पणियों का साहस के साथ विरोध किया। हालांकि इन छात्राओं ने पहले स्कूल प्रशासन से इस घटना की शिकायत की लेकिन कोई कार्रवाई नहीं होने के बाद इन्होंने खुद ही विरोध का झंडा बुलंद किया। इन हिम्मती स्कूली छात्राओं पर जिस तरह बेरहमी से सामूहिक हमला किया गया, उससे ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ और ‘महिला सुरक्षा’ जैसे सरकारी नारों की असलियत सामने आ गई है।

दरअसल, यह अपने तरह की एक अलग घटना है, जिस पर समाजशास्त्रियों को अध्ययन करने की आवश्यकता है। आखिर वह कौन सी प्रवृत्ति है, जो सही और गलत के बीच भेद करने के विवेक को मार रही है। स्त्रियों को सम्मान और उन्हें सुरक्षा देने का संस्कार परिवार से ही मिलता है। मां-बाप अपने बच्चों को यही नसीहत और सीख देते हैं कि पड़ोसी की बेटी-बहन को अपनी बहन-बेटी की नजर से देखना चाहिए।

लेकिन सुपौल की घटना ठीक इसके उलट बयां कर रही है। नाबालिग स्कूली छात्राओं के खिलाफ बिगड़ैल और मनचले युवकों के मां-बाप ने बढ़-चढ़ कर हमला किया। आखिर यह कैसा ‘पुत्र मोह’ जो महिलाओं की इज्जत और सम्मान के साथ खिलवाड़ करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दे। स्कूली छात्राओं के विरुद्ध हुए इस सामूहिक हमले ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की प्रशासनिक दक्षता पर भी सवाल खड़े कर रहा है।

अभी पिछले दिनों मुजफ्फरपुर बालिका आश्रम में बच्चियों के यौन शोषण के मामले में नीतीश सरकार कठघरे में खड़ी थी। इसलिए यह कहा जा सकता है कि प्रशासन के पंगु होने के कारण इस सूबे में लोग कानून को हाथ में लेकर कथित अपराधियों को दंडित करने में लगे हैं। अगर यह सच है तो कानून का भय समाप्त होना बहुत खतरनाक संकेत है।