लोकपाल क्यों नहीं?

,

लोकपाल की नियुक्ति अब तक न होने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने जो रु ख अपनाया है वह स्वाभाविक है। कोर्ट ने केंद्र सरकार को दस दिनों में शपथ पत्र के माध्यम से बताने को कहा है कि लोकपाल की नियुक्ति की प्रक्रिया कहां तक आगे बढ़ी है। न्यायमूर्ति रंजन गोगोई और आर भानुमति की पीठ का रवैया केंद्र सरकार के खिलाफ काफी कड़ा था। हालांकि सरकार की ओर से पेश महाधिवक्ता के के वेणुगोपाल ने अदालत को बताया कि लोकपाल चयन समिति की शीघ्र ही बैठक होगी। जाहिर है, इस जवाब से अदालत संतुष्ट नहीं थी तभी तो उसने यह निर्देश दिया है।

अब केंद्र को बताना होगा कि लोकपाल की नियुक्ति के बारे में क्या कदम उठाए जाने हैं, और इसकी समय सीमा क्या है?  दरअसल, गैर सरकारी संगठन कॉमन कॉज इसके लिए लंबे समय से न्यायिक लड़ाई लड़ रहा है। इसी संगठन की याचिका पर 27 अप्रैल, 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश पारित किया था कि मौजूदा कानून किसी सदस्य की अनुपस्थिति से लोकपाल की नियुक्ति को नहीं रोकता। अदालत का कहना था कि संसद की स्थायी समिति ने लोकपाल कानून में संशोधन का प्रस्ताव भेजा है।

मौजूदा कानून के अनुसार चयन समिति में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में लोक सभा अध्यक्ष, मुख्य न्यायाधीश या उनके द्वारा नामित सुप्रीम कोर्ट का कोई न्यायाधीश तथा प्रख्यात न्यायविद् सदस्य होंगे। इसके अनुसार लोक सभा में विपक्ष का नेता नहीं है तो समिति के अन्य सदस्य जाने-माने न्यायविद् को चुन सकते हैं। इस कानून में नियुक्ति पैनल में लोक सभा में विपक्ष का नेता होने का प्रावधान है। चूंकि लोक सभा में विपक्ष का नेता नहीं है, इसलिए सरकार इस आधार पर इस नियुक्ति को टालती रही है। कॉमन कॉज ने सुप्रीम कोर्ट में सरकार के विरुद्ध अवमानना याचिका दायर की हुई है।

उसकी दलील है कि सरकार ने अदालत के आदेश को भी दरकिनार किया हुआ है। समझ से परे है कि जब जनवरी, 2014 में लोकपाल एवं लोकायुक्त कानून बन गया तो फिर इनकी नियुक्तियां क्यों नहीं हो रहीं? सुप्रीम कोर्ट द्वारा कानून पर स्पष्ट राय व्यक्त करने के बाद तो इसे रोकने का कोई कारण नहीं दिखता। अगर केंद्र को लगता है कि इस कानून में संशोधन की आवश्यकता है तो उसे इसका नया संशोधित प्रारूप संसद में पेश करना चाहिए। अगर वह इस कानून को ठीक मानती है तो फिर लोकपाल की नियुक्ति होनी चाहिए। उसके आधार पर राज्य भी लोकायुक्तों की नियुक्तियां करेंगे।