लालकिला पर संग्राम

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दिल्ली के लाल किले को डालमिया भारती समूह द्वारा पांच वर्ष के लिए 25 करोड़ रु पये में गोद लेने का तीखा राजनीतिक विरोध हो रहा है। आम लोगों को भी अचानक आई यह खबर समझ में नहीं आ रही है कि आखिर किसी निजी कंपनी के हाथों इस ऐतिहासिक इमारत को देने का क्या कारण हो सकता है?

हालांकि यह सच है कि डालमिया समूह इससे कोई मुनाफा नहीं कमाएगा। इसके विपरीत वह पांच साल तक इसका रख-रखाव करेगा तथा मूलभूत सुविधाओं का विस्तार करेगा। मूलभूत सुविधाओं की विस्तृत सूची है और सबके लिए समय सीमा भी तय है। घोषित योजनानुसार यदि सारे काम हो गए तो लाल किला का पर्यटकों की दृष्टि का कायाकल्प हो जाएगा।

इस समय भले हंगामा हो रहा है, लेकिन सरकार ने काफी पहले ही ‘अडॉप्ट अ हेरिटेज परियोजना’ की घोषणा की थी, जिसमें निजी कंपनियों से देश के धरोहरों को गोद लेने की अपील की गई थी। सरकार ने पर्यटन मंत्रालय और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग वाली समिति की मदद से मार्च में 31 स्मारक मित्रों की सूची बनाई थी। यह सब समाचार पत्रों के माध्यम से सामने आ रहा था।

वास्तव में लाल किला एकमात्र ऐतिहासिक स्मारक नहीं है, जिसे सरकार विकास करने के लिए निजी कंपनियों को एक निश्चित समय के लिए गोद देने जा रही है। यह बात ठीक है कि ये कंपनियां इन धरोहरों से कुछ भी कमाएंगी नहीं। किंतु वे अपना साईन बोर्ड लगाएंगी कि इसे उन्होंने विकसित किया है। ऐसे पर्यटन स्थल पर जितनी भारी संख्या में प्रतिदिन लोग आते हैं, उसे देखते हुए कपंनियों के प्रचार के लिए ये काफी अनुकूल है।

यानी कपंनियां जो धन लगा रहीं हैं, उसके पीछे मूल भाव केवल किसी ऐतिहासिक धरोहर को विकसित करने का दायित्व निर्वहन नहीं, बल्कि प्रचार भी है। वैसे दुनिया के अनेक देशों में निजी कंपनियां ऐतिहासिक इमारतों की देखरेख करती हैं। फिर भी सरकार की सोच पर प्रश्न तो खड़े होते ही हैं। क्या सरकार ने मान लिया कि इन इमारतों की समुचित रख-रखाव उसके वश की बात नहीं है?

अगर नहीं माना तो फिर स्वयं ऐसा करने में हर्ज क्या है? ज्यादातर ऐतिहासिक इमारतों के अंदर जाने के टिकट लगते हैं। जहां नहीं है, वहां टिकट लगाया जा सकता है। उससे होने वाली आय से रख-रखाव एवं आधारभूत सुविधाओं को आसानी से विकसित किया जा सकता है।