रेट बढ़ने का असर

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भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा रेपो दर को 0.25 प्रतिशत बढ़ाकर 6.25 प्रतिशत कर दिए जाने पर आर्थिक जगत ने यदि त्वरित नकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं दिया है तो इसका अर्थ है कि सबको ऐसा किए जाने का अनुमान था। रिवर्स रेपो दर भी इसी अनुपात में बढ़ाकर छह प्रतिशत हो गया है।  रेपो दर वह दर होती है, जिस पर रिजर्व बैंक बैंकों को नकदी उपलब्ध कराता है। रिवर्स रेपो दर वह है, जो रिजर्व बैंक बैंकों द्वारा जमा की गई रकम पर देता है। यह बात ठीक है कि इससे बैंकों का कर्ज महंगा होगा और मकान, वाहन के कर्ज की ईएमआई बढ़ सकती है।

किंतु यह वृद्धि इतनी अधिक नहीं होगी, जिससे किसी को बहुत ज्यादा परेशानी हो। रियल्टी क्षेत्र पर इसके व्यापक नकारात्मक असर का आकलन सही नहीं है। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि केंद्र में नरेन्द्र मोदी सरकार आने के बाद पहली बार रेपो दर में वृद्धि हुई है। रिजर्व बैंक ने इसके पहले 28 जनवरी 2014 को रेपो दर बढ़ाया था। उसके बाद की मौद्रिक समीक्षाओं में या तो इसमें कमी लाई गई या फिर स्थिर रखा गया। इस बात मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की बैठक तीन दिन चली और कहा गया है कि गवर्नर उर्जित पटेल सहित सभी छह सदस्यों ने सर्वसम्मति से इसे बढ़ाने का निर्णय लिया। वास्तव में विश्व बाजार में कच्चे तेल के दाम बढ़ने से महंगाई को लेकर जिस तरह की चिंता व्याप्त है, उसमें रिजर्व बैंक के पास ऐसा किए जाने का ही विकल्प उपलब्ध था।

हालांकि पटेल ने टिकाऊ आधार पर मुद्रास्फीति को चार प्रतिशत तक सीमित रखने के लक्ष्य को हासिल करने के प्रति प्रतिबद्धता जताई है। खुदरा मुद्रास्फीति अप्रैल-सितम्बर के लिए 4.8 से 4.9 प्रतिशत और दूसरी छमाही में 4.7 फीसद रहने का अनुमान लगाया गया है। तेल के बढ़ते मूल्य और डॉलर की मजबूती के बीच महंगाई को नियंत्रण में रखना एक बड़ी चुनौती है।

किंतु राहत की बात है कि केंद्रीय बैंक ने वर्ष 2018-19 के लिए आर्थिक वृद्धि के अनुमान को 7.4 प्रतिशत पर बरकरार रखा है। यह सच है कि घरेलू आर्थिक गतिविधियों में हाल की तिमाहियों में सुधार आया है और उत्पादन तथा मांग के बीच जो फासला था, वह करीब-करीब समाप्त हो गया। रेपो दर वृद्धि के साथ यह सिलसिला आगे जारी नहीं रहने का वक्तव्य देकर रिजर्व बैंक ने कारोबारियों एवं बाजार को वास्तव में आस्त कर दिया है। यही कारण है कि रेपो दर वृद्धि की घोषणा के बावजूद शेयर बाजार बढ़त के साथ ही बंद हुआ।